Friday, 28 December 2012

"शोक में शोर-समाज में सन्नाटा"

 "शोक में शोर-समाज में सन्नाटा"

अब शर्म भी आएगी
गुस्सा भी आएगा
दर्द भी होगा
और तख्तियों का वो हुज़ूम दिखेगा
कि शहर के सड़क-गाँव के नुक्कड़
सब मानो इंसाफ को मोहताज़ हों
मगर ये इंसाफ कौन करेगा
सरकार.....क़ानून....???
सूली कौन चढ़ेगा.....???
वो दरिन्दे जिनकी हैवानियत
भी इंसानियत के लिवाज़ में है
कौन थे वो
आसमान से आये थे
या फिर थे पाताल के पत्थर
नहीं ना
वो तो तुम्हारे ही बसिंदे हैं
जिन्हें तुमने ही पाला है
शिला-चमेली-मुन्नी
सरीखे नामों को बदनाम कर
अपने शौख़ को नवाज़ा है
फ़िर क्यूँ  आज मेरी मौत पर
अजीब तमाशा है
अरे मै पहली सितमग़र तो नहीं
मुझसे पहले भी कई माँओं ने
अपनी बेटियों को
हवस के हाथों दब
दम तोड़ते देखा है 
तो क्यूँ शोक में शोर
समाज में सन्नाटा है
ये कैसा बनावटी रंग है
ये कैसा बनावटी ढंग है
कि मौत पर मेरे
बह रहे हैं घड़ीयाली आंसू 
सदमा ही सदमा है मुल्क में
पर सबक से सरोकार नहीं
आज दामनी मरी
कल दमन होंगी सारी नारियाँ
क्यूंकि तुम्हे तो इंतज़ार है
सरकारों के बदलने का
क़ानूनों को बदलने का
पर तुम कभी
खुद को बदल ना सके
पर तुम कभी 
खुद को बदल ना सके !!!

सत्या "नादान"

Wednesday, 19 December 2012

"दामिनी" बनी "द्रोपती" !!!

"दामिनी" बनी "द्रोपती" !!!


ये कैसी अजीब आवाज़ें है
जो सिर्फ चीख पर चीखती हैं
कहाँ थी यें
जब मुझे नोंच रहे थे दरिंदे
शहर था सफ़र था सड़क था
सब के सब उनके ही थे बसिंदे
फिर भी मै द्रोपती बनी
और द्रोपती भी क्यूँ कहूँ मै खुद को
वह तो शतरंज के मात की शौगात थी
पर यहाँ ना तो कोई खेल था
ना ही जंग थी मेरी उनसे
तो क्यूँ आज
अबला-असहाय-अधमरी
सी पड़ी हुई हूँ इस बिस्तर पर
शर्मसार मै-खामोश मै दर्द मुझे है
तो खोया कौन
वो जो सोते हुए भी चिल्ला रहे हैं
जुर्म के शहर मे
सांत्वना के आंसू बहा रहे हैं
जो कहते है डर मुझे भी लगता है
ऐसे मंज़रों से
जानकर भी हवस के साँप को
दूध पिला रहे हैं

जानकर भी हवस के साँप को
दूध पिला रहे हैं !!!


यह किस दहशत की घड़ी है
कि मुल्क का मुक्कदर
बनाने वाले ही
बेबसी के गीत गाने लगे
क़ानून कंगनों मे जकड़ी
ज़ालिम जुर्म की
दास्ताँ सजाने लगे ?????




Monday, 3 December 2012

"ग़ुमशुदा दीवारें"

"ग़ुमशुदा दीवारें"

क्या भूल गए तुम्हे वह सब
तुम जिनकी बनावट हो
अगर हाँ तो क्यूँ ?
और नहीं तो क्यूँ ?
इन दीवारों पर सन्नाटा है
ना ही अब ख़ुशी है
ना ही वो ग़म
जिसे कभी हमने संग बांटा है
कहीं ऐसा तो नहीं
कि हम सिर्फ़ ज़रूरतों के मुसफ़िर थे
सफ़र ने बेगानों से अपना बना दिया
वो हमदर्दी वो प्यार
वो गुस्सा वो ललकार
सब के सब बनावटी रंग थे
जो दूरियों के दरम्याँ बह गए
और हक़ीकत में
अतीत की यादों में खोई
वर्तमान के ख़ामोशी में रोती
भविष्य के सवालों में उलझी
तुम ही तनहा रह गई
तुम ही तनहा रह गई !!!

सत्या  "नादाँ"





Monday, 26 November 2012

"साज़िश की वो रात"

***26/11 के वीर सपूतों के शहादत को सलाम एवं सभी को भावपूर्ण श्रद्दांजलि***

साज़िश की वो रात
जिसने सोने न दिया कभी
समंदर से ज़मीन तक
दहशतों का मंज़र
अमन के आड़ में
आतंक की दस्तक़
ज़िंदगी को जीते जी
मौत नज़र आने लगी
आग-बारूद-गोलियों में
मुल्क़ की शांति समाने लगी
हंसती-दौड़ती-बोलती साँसें
सहमी-बेबस-रोती सी
शहर में छाने लगी
सहमी-बेबस-रोती सी
शहर में छाने लगी.....


(शुक्र है माँ के उन शेरों का जिन्होंने देश की रक्षा के लिए स्वयं  को निक्षावर कर दिया)

वो तो माँ को यकीन था
अपने वीर सपूतों पर
जो दुश्मन को दीवार
भेंद भी मार गिराएंगे
प्राणों की आहुती दे देंगे
पर लहराता तिरंगा
कभी न झुकायेंगे

प्राणों की आहुती दे देंगे
पर लहराता तिरंगा
कभी न झुकायेंगे !!!!!!

सत्या "नादान"











Wednesday, 3 October 2012

"मय मेरी महबूबा"


"मय मेरी महबूबा"

मय से मोहब्बत की है मैने
जो हर रोज़
उस गली का दीदार करता हूँ
लोग कहते हैं
बेकार-बेकाम-बेगैरत जिसे
उसी से मै बेपनाह प्यार करता हूँ
ना पूछती है डगर
ना पूछती है मंज़िल का पता
भटकता हूँ जब भी
तनहाई के अंधेरों में
नफ़रत-जुर्म-ख़ुदग़र्ज़ी
माया के मेलों में
तब ले जाती है
खुशियों के आँगन में
जहाँ गम भी गुम हो जाता
जहाँ गम भी गुम हो जाता.....

सत्या "नादाँ"


Monday, 17 September 2012

"इंतज़ार"


"इंतज़ार"

शाम से रात हो गई
'मय' से मेरी मुलाक़ात हो गई
जाम पर जाम छलकने लगे
मेरे नैना तेरे चाहत को
तरसने लगे
किन्तु मेरी किस्मत
ही एक पहेली थी
कि ना 'शराब' चढ़ी
ना 'शबनम' मिली
रात की रंगत भी बेरंग होने लगी
नीद आँखों से खोने लगी
नीद आँखों से खोने लगी...

तेरे इंतज़ार की तड़प में
आंसुओं ने बदन को तार-तार कर दिया
बसंत की कश्ती में
सादगी का समन्दर भर दिया
और मै यह नहीं कहता
कि तेरे आने की हसरत में
बैठा रहा रात भर
मै तो बस सोचता हूँ
कि इस 'नादान' दिल ने
क्यूँ दिल लगी कर ली
क्यूँ दिल लगी कर ली !!!

सत्या 'नादान'

Saturday, 8 September 2012

"कोयले की कालिख़"


"कोयले की कालिख़"

वाह रे 'कालिख़'
तेरा 'रंग' भी कितना बेमिसाल
कि तुझसे लग
'कोयला' भी 'काला' हो गया
ना मन - 'मोहन' बोले
ना 'हाथ' दिखा
'कमल' खिल-खिलाकर हंसा
'साइकल' ने भी की सेंध मारी
'लेफ्ट-राईट' सब 'सेंटर' पर भारी
'कैग-बम' से
संसद भी हारी
देखते ही देखते
कुछ एैसा हुआ 'विस्फ़ोट'
ना 'संसद' चली ना 'सांसद' चले
जनता के 'पैसे' को लगी 'चोट'
'कालिख़' के 'कलंक' में
सब कुछ खो गया
और बिन जले ही 'कोयला'
'मुल्क' में आग का 'ज्वाला' हो गया !!!
'मुल्क' में आग का 'ज्वाला' हो गया !!!

सत्या "नादान"

Friday, 7 September 2012

'तुझे ही चाहा था मैंने' !!!


'तुझे ही चाहा था मैंने'

तेरी आँखों से दूर
बादल से घने अँधेरे में
मन की आशाओं से घिरा
बेबस बंधा बंदिशों में
मिलन की बेताबी को तरसूँ ...

तेरे स्नेह के संगम में
प्रियशी भीगा था मै कभी
पर वो मधुर सफ़र की घड़ी
ही थी ऐैसी कि आज भी
खुद को गिला समझूँ
खुद को गिला समझूँ......


तन तड़प से
मन मायूसी में खोया
तेरी प्रतिमा को
सिने से लगा रोज़ हूँ रोया
अपनी बातें तुझसे कहने को
बहुत है सोचा
फिर समय की सीमा ने
जुबां की खामोशियों को सींचा...

मै कहकर भी कह ना पाया
कि तुझसे प्यार है कितना
और तू सुनकर भी सुन ना पायी
कि तुझसे क्यूँ यह 'नादान'
बातें करता था इतना
बातें करता था इतना !!!

सत्या "नादान"

Wednesday, 5 September 2012

"गुरु" का "आत्मा" में घर

"गुरु" का "आत्मा" में घर 

किताब समीप होकर भी
शब्द अर्थहीन थे
दिशा का पता नहीं
दशा नादानी से रंगीन थे

इतिहास पूरा खाली का खाली
भूगोल ब्रह्माण्ड से अलग
गणित का ज्ञान नहीं
जो था दिमाग शून्य से परिपक्व

तभी मिले गुरु
किया ज्ञान का अध्याय शुरू
मिली शिक्षा की सीख
मिटी इन्द्रियों की भूख
दिखी सफलता की डगर
खुशियों का नगर

ज्ञान का न कोई द्वार है
वह आकाश से है बड़ा
पाताल तक है धरा
जिसकी सीमा है इच्छा
जिसका प्रकाश सूर्य से प्रखर
तब ज्ञात हुआ
इस नादान मन को
कि क्यूँ ज़रूरी है
आत्मा में एक गुरु का घर
आत्मा में एक गुरु का घर !!!


सत्या "नादान"

Saturday, 25 August 2012

"दिल्ली" तु बहुत "हसीन" है

दिल्ली तु बहुत हसीन है
थोड़ी चुलबुली थोड़ी शरारती 
बार-बार प्यार से निहारती 
अपने तो अपने 
मुसाफिरों के दिलों को भी ताड़ती 
तु प्यार की  रंगत से रगीन है 
दिल्ली तु बहुत हसीन है...

तेरा मो-मोस इतना भाता 
कि बिन खाए रह नहीं पाता 
तेरी रौनक एैसी छाई 
क्या हिन्दू क्या मुस्लिम 
क्या सिख और इसाई 
तेरे दामन से जो भी लिपटा 
हो गया भाई-भाई...

लाल किला हो या इंडिया गेट 
कुतुबमीनार हो या संसद भवन 
तु प्राचीनता में नवीनता की 
अद्दभूद धरोहर है 
दिल्ली तु खुशियों का अनमोल शहर है 
दिल्ली तु खुशियों का अनमोल शहर है......

तुझे छोड़ जाने का दिल मेरा 
भी करता नहीं 
पर क्या करूँ कोई तो है 
एक शहर में...जो मेरे बिना रह सकता नहीं 
जो मेरे बिना रह सकता नहीं !!!

सत्या "नादान"

Thursday, 16 August 2012

"इसे हार कहूँ या लड़ने की जिज्ञासा"

"इसे हार कहूँ या लड़ने की जिज्ञासा"

कुछ खोकर मै कुछ पाने आया
सपनो को सजाने आया
शहर से शहर की दुरी बड़ी थी
मन की आशा उस तरफ खड़ी थी
दिल में बेचैनी की ललक उठ रही थी
माया छोड़ मै उसे पाने आया
इच्छा की प्यास बुझाने आया
कुछ खोकर मै कुछ पाने आया.....

उससे रिश्ते बनाने के लिए
खुद को तपाता रहा
सुबह का घर से निकला
शाम तक पसीना बहाता रहा
कि अब तो मिल जाएगी वो
जिसकी चाहत में मै आया हूँ
पर अफ़सोस दूरियां जितनी घटी
फ़ासले उतने बढ़ गए
पर अफ़सोस दूरियां जितनी घटी
फ़ासले उतने बढ़ गए......

और करीब आकर भी उसे पा ना सका
चाहकर भी उसे अपना ना सका
गुस्से से बार-बार बौखलाता रहा
उलझाते प्रश्नों से स्वयं को समझाता रहा
तभी उत्तर की एक घटा आई
मुझे उसका रहस्य बतलाई
तब एहसास हुआ अपनी नादानी का
कि जिसे पाने के लिए तड़पता रहा
वो न अजुबां थी ना पहेली थी
बस मै ही वक़्त को समझ न सका
कि वह गति में मुझसे तेज़ है
कि वह गति में मुझसे तेज़ है !!!


सत्येन्द्र "सत्या"







Sunday, 12 August 2012

"स्वतंत्रता के '65' साल"

"स्वतंत्रता के '65' साल"

भारत की आज़ादी को आज 65 वर्ष हो गए 15 अगस्त1947 को लहराते तिरंगे से निकला स्वतंत्रता का वह संखनाद जिसने आज़ाद भारत की ऐसी पृष्ठभूमि रखी जहाँ खोने को कुछ नहीं पर पाने को पूरा आकाश था ! आज़ादी के पश्चात समय बदला लोग बदले और समय के साथ लोगों की मानसिकताएं भी बदली जिसकी बदौलत भारत ने सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक क्षेत्र में वह मुकाम छुआ....... कि कल का अतिपिछड़ा भारत दुनिया में नई शक्ति के रूप में उभर सम्पूर्ण विश्व के मानचित्र  पटल पर अपनी एक ऐसी छाप छोड़ी जिसे नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता..... किन्तु क्रमश: इस बदलाव के दौर में जो चीज़ शायद अब भी नहीं बदली वह है उस ध्वज के प्रति भारतीयों की सद्भावना समर्पण और त्याग जिसकी आज़ादी के ख़ातिर देश के उन वीर सपूतों ने अपने प्राणों की आहुती दे हमें स्वतंत्रता दिलाई और आज़ादी के पश्चात तिरंगे की शान के लिए कई जवानों ने ख़ुशी से शहादत का दामन थाम लिया!

बीते ६ दशकों में कई उतार चढ़ाव आए अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा किन्तु हर वक्त सफलता का जज़्बा हार की काया पर भारी पड़ता गया और हम परत दर परत कामयाबी के सफ़र पर बढ़ते चले गए.....इसी कड़ी में भारत की भुजाओं को मज़बूती प्रदान करते ब्रह्मोस अग्नि, त्रिशूल पुरे विश्व में भारतीय सेना का गौरव बढ़ाते हैं जिनकी मारक क्षमता इतनी कि इनके परिक्षण मात्र से कुछ मुल्कों को बेचैनी के पसीने निकलने लगे और हम आज उन देशों के कतार में शुमार हो गए जिन्हें उँगलियों पर गिना जा सके (इंटरकांटिनेंटल ब्लास्टिक मिसाइल ग्रुप)..वहीं खेलों में कभी ओलिम्पिक मेडलों को तरसते भारत ने लन्दन ओलिप्म्पिक में ६ मेडल जीत अब तक का सबसे उम्दा प्रदर्शन कर दिखाया और लन्दन मिशाल बनी भारत के उस ख़ुशी की जहाँ कई दशकों से मेडल के सूखे का साया था........

पर इस मुल्क की विडंबना देखिए कि जब समूचा देश  इस ज़द्दोजहद में लगा था कि हम अपने भविष्य को और भव्य कैसे बनाए उस समय कुछ लोग तुलनात्मक चश्मा धारण किए इस बात को बताने की फ़िराक में ज़्यादा रहते हैं कि हमने अब तक क्या खोया....हम अमेरिका से इतने पीछे क्यूँ हैं?..चीन हमें हर बार आँख क्यूँ दिखाता है?....प्रश्न.....प्रश्न......और मात्र प्रश्न?..आलम यह हो जाता है कि प्रश्नों का ऐसा जमावड़ा लग जाता हैं कि उत्तर की आकंक्षा रखने वाला शख्स भी इतना मायूस हो जाता.....कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता और धीरे-धीरे इन उदासीन आत्माओं की संख्या इतनी हो जाती है कि लगता है देश में अराजकता सा माहौल है...मै कत्थई यह नहीं कह रहा कि भारत जैसे लोतांत्रिक देश में आलोचना करना उचित नहीं है न ही रामदेव-अन्ना सरीखे लोगो की निंदा करने की कोशिश कर रहा हूँ ! मै तो बल्कि उनकी नज़र को उस दिशा में ले जाना चाहता हूँ जहाँ उम्मीदों का सवेरा..अरमानों की रात होती है...अर्थात अगर हम उस कड़वी सच्चाई से रूबरू हों तो समझ आएगा कि इतनी बड़ी कायनात लेकर भी चीन को उन तिब्बतियों से डर लगता है जो हर दफ़ा उनके अधिकारों को कुचलता रहता है किन्तु भारत का शौर्य देखिए हमने तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा को अपना शरणार्थी बनाकर नहीं बल्कि मेहमान के रूप में अपने देश में सम्मान दिया.....यह वह मुल्क है जहाँ मोदी विकास के लिए कम बल्कि मानवीय नरसंहार के लिए अधिक प्रचलित हैं. वहीं चीन के विकास की दिवार ही मानवीय मूल्यों की लाशों पर खड़ी है.....अमेरिका ने तो १७ वीं शताब्दी में ही आज़ादी प्राप्त कर ली थी किन्तु नस्लवाद का असर देखिये कि २००७ में ओबामा की जीत को एक वर्ग की जीत के रूप में देखा गया और हिलेरी आज भी आडवाणी (प्रधानमंत्री की ख्वाईश) की तरह सपना सजोए बैठी हैं कि कभी तो वह पहली अमेरकी महिला राष्ट्रपति बनेंगी   ..WTC पर हमला अमेरिकी आज़ादी पर सबसे बड़ा आघात था पर खुद को विश्व का सबसे ज़्यादा शक्तिशाली देश कहनेवाले अमेरिका लादेन को ढूंढ़ निकालने में १० साल लगा दिया.और वह मिला भी तो उस मुल्क में जो हमारा दोस्त हो या न पर पड़ोसी तो है और पड़ोसी से झगड़ा कब तक कभी कभी आप आर्थिक-राजनीतिक तौर पर कितने भी शक्तिवान क्यूँ ना हो जाएँ पर दुनियां की नज़र में भौगोलिक राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए तो पड़ोसी को साथ लेकर चलना ही होगा......तो बस आज आज़ादी के इस अवसर पर एक संकल्प ले अपनी उर्जा को इस तरह से उपयोग करने का कि आने वाली दशके-सदियाँ ख़ुशी और समृधि से भरी हों.........

मै इससे पूरी तरह वाक़िब हूँ कि देश में आज़ादी के ६५ साल बाद भी कुछ लोग भूखे सोते हैं...आज भी माँ का लाडला किताबों से कोसों दूर हैं.......और नन्ही उम्र में काम करता है.कि घर में रोटी आ सके  ..भ्रष्टाचार का सांप दिन प्रतिदिन मोटा होता जा रहा है....और सिस्टम लोकतांत्रिक मिशाल का बस तमगा बन के रह गया है.....जिसे स्वार्थ के खेल में हमारे राजनेता  झुनझुने की तरह बजाकर मज़ा लेते हैं ........मै अपने लेख में इन सबका जिक्र कर सकता था...पर आज स्वतंत्रता का वह पर्व है जिसे पाने के लिए हमने शहादत की बड़ी कीमत चुकाई है इसलिए आज का दिन हैं कि हम उन वीरों को याद करें और अपनी स्वतंत्रता पर गर्व करें.......


कभी छोटा था तो मास्टर जी के लिखे लेख को मंच पर पढ़ने के लिए हफ्ते भर पहले से रटना शुरू कर देता क्यूंकि उस वक्त इतना सक्षम नहीं था कि शब्दों के भावार्थ को समझ सकूँ...........परन्तु आज उम्र की नादानी से बाहर निकल 'स्वतंत्रता के 65 साल' पर लिखना शुरू किया तो एहसास हुआ कि भारत की व्याख्या इतनी व्यापक है कि, जिसे पन्नों पर उतारने के लिए अनगिनत कलमों को अपने स्याहियों की कुर्बानी देनी पड़ेगी !

सत्येन्द्र "सत्या"

Saturday, 11 August 2012

मुंबई के 'आज़ाद' को आज क्या हो गया ???


मुंबई के 'आज़ाद' को आज क्या हो गया 
कहीं पत्थर... कहीं आग
किसी का गुस्सा..किसी का जज़्बात 
शोलों में क्यों बदल गया 
बड़ी हंसी -मासूमीयत से जीने वाला 
शहर का वो अनमोल हिस्सा 
किसकी नज़र से बिखर गया 
किसकी नज़र से बिखर गया........

क्यूँ अमन का आसरा 
हिल रहा साज़िश की मार से 
क्यूँ शहर की चिड़ियाँ 
डर.. बैठ जाती हैं.
हर दफ़ा बादलों के 
बदलते बयार से  
क्यूँ मोहब्बत को मौत का 
कपड़ा पहना रहे हैं कुछ लोग 
क्यूँ प्रेम के वादियों में 
हिंसा के गीत गा रहे कुछ लोग 
हिंसा के गीत गा रहे कुछ लोग.....

क्या इस शहर की शांति 
किसी के आँख में समा रही 
क्या नफरत के आशिकों को 
प्यार की ज़िन्दगी रास नहीं आ रही 
क्या वो समझ रहें 
कि हर जगह...
ख़ामोशी का ही ख्याल है 
महज़ कुछ क्षण का दुःख 
फिर भूल जाते..सब मलाल है 
कहीं इस बात पर ही इतरा कर 
अपने मंसूबो की दिवार 
तो नहीं बना रहे वो लोग 
कहीं इस बात पर ही इतरा कर 
अपने मंसूबो की दिवार 
तो नहीं बना रहे वो लोग..........

अगर ऐसा है तो 
मै उनसे कहता हूँ 
कि तुमने देखा है मेरा बस हौसला 
मेरे आग की लौ अभी देखी नहीं
तुमने देखी है समंदर की शीतलता 
पर उसके लहर का कहर देखा नहीं 
हम तो बस "नादान" हो जाते हैं प्यार में 
पर वक़्त की बैचनी में 
बिखरे न आज है...ना कल थे कभी 
पर वक़्त की बैचनी में 
बिखरे न आज है...ना कल थे कभी !!!

सत्येन्द्र "सत्या"


Wednesday, 1 August 2012

"राखी का बंधन 'अनमोल' है"


"राखी का बंधन 'अनमोल' है"

तू मुझसे छोटी
बड़ी चंचल-ज़िद्दी
घर की अनमोल 'मोती' है
सबके सपने सजे तुझसे
सबकी आँखों में तेरा ही बसेरा है
तेरे 'शरारत' के रंग से
रंगी ये दीवारें
तेरे ख़ुशी की किरण
हम सबका सबेरा है...

पापा की 'दुलारी'
मम्मी की 'चिरैया' (चिड़िया) है तू
एक दिन 'उड़' जाएगी घर से
मालुम है उसे जानकार भी
तुझे अपनी "जान" कहती है...

मेरा मन भी बंधा है तेरे प्यार से
तेरी उमंग इस त्यौहार से
जो तेरे स्नेह की 'राखी' पाकर
एहसास हो रहा इस मन को
कि बस 'फ़ासले' बढ़ गए
इस 'शहर' से उस 'शहर' के
पर 'बंधन' के दुलार की 'दुआ'
कल भी थी.....आज भी है
बहन तेरी राखी कल भी
'प्रेम के परम्परा' से 'बेमिसाल' थी
आज भी 'बेमिसाल' है..आज भी 'बेमिसाल' है.....

सत्येन्द्र "सत्या"

Saturday, 21 July 2012

"अम्मी मै भी रखूँगा रोज़ा"


"अम्मी मै भी रखूँगा रोज़ा"

अम्मी 'नादान' कह मत रोक मुझे
मै भी 'खुदा' से प्यार करता हूँ
उसकी याद आती है इतनी
कि हर रोज़ हर दफा
घर से मदरसे तक
हर पल की 'नमाज़' पढ़ता हूँ
अम्मी 'नादान' कह मत रोक मुझे.......

मै जानता हूँ तेरा दिल
जो धड़कता है मेरे लिए
बड़ा ही 'नाज़ुक' और 'नवाज़िश' है
पर तू ही बता कैसे भूला दूँ
मै तेरी उस 'तालीम' को
जो इंसान को 'अज़ीज़' बना
'खुदा' के 'डगर' पर चलने
कि करती गुज़ारिश है
अम्मी 'नादान' कह मत रोक मुझे.....

तू ना डर अम्मी..मुझे कुछ न होगा
अपने 'चाँद' पर कम से कम
इतना तो कर भरोसा
दे 'ईशाद' मुझे कि मै
खुदा के पनाह में जा सकूँ
"रमज़ान" का 'क़ाईदा' अपना
इस मन को 'पाक' बना सकूँ
इस मन को 'पाक' बना सकूँ.......

खुदा की 'तासीर' मान
त’अज्जुब  की ना बात कर
मेरी उम्र पर ना जा तू
मेरे इरादे का ख़्याल कर
बस यही 'अऱ्ज' मेरी है तुझसे "अम्मी"
कि 'नादान' कह मत रोक मुझे
कि 'नादान' कह मत रोक मुझे.......

सत्येन्द्र "सत्या"

Thursday, 19 July 2012

"जब प्यार पनपता है"

"जब प्यार पनपता है" 



तुझमे शर्म बहुत है मुझमे हया नहीं
तुझमे चमक बहुत है मुझमे नशा नहीं
तू सीधी सुन्दर शालीन बहुत है
पर मै  भी मन का मैला नहीं...

नैन से नैन मिलते रहते तेरे-मेरे
हर पल हर घड़ी इस शहर में
जिसमे कसूर तेरा और मेरा नहीं
ये तो जवाँ दिल की तड़प
और वक़्त की हिमाकत का जादू है
जिस पर ज़ोर तेरा और मेरा नहीं....

मै कहने की कोशिश में रह जाता हूँ
तू कहकर भी नादान हो जाती है
नज़रों की दूरियों को पता ही नहीं चलता
कि दिल में कितनी नज़दीकियाँ हो जाती है
शायद इसी को प्यार कहते हैं "प्रियम्वदा" 
कि हम चाहते हैं कि छिपा लें इसे दुनियां से
पर यह पुष्प की वो सुगंध है
जो फैलती रहती है खिलती रहती है
जो फैलती रहती है खिलती रहती है.........................

सत्येन्द्र "सत्या"

Friday, 13 July 2012

नारी का कुछ ना 'मोल' है!!!


"नारी का कुछ ना मोल है" 

मेरे आबरू से खेलते कुछ लोग
मेरी इज्ज़त लुटती सरे आम है
मै बस नाम की रह गई हूँ
वो...सीता... तुलसी... गंगा...
जो अब हो रही
मानवीय दुषात्मा का शिकार है
और मिली भी तो
कैसी स्वतंत्रता मुझे
कि ज़िन्दगी बन गई
पुरषों की गुलाम है
कभी पीटा-कभी जलाया
कभी अरमानों को
तालिबानी-फरमानों
से लटकाया......

समय बदला लोग बदले
प्राचीनता-नवीनता में समा गई
पर बदली नहीं तो वो मानसिकता
जो कल भी पुरुष-प्रधान थी
आज भी पुरुष प्रधान है
आज भी पुरुष प्रधान है....

सोचती हूँ तो आँख बह जाती है
मुल्क के इस मंज़र को देखकर
कि सभ्यता के ढोल में
इंसान की दरिंदगी का बोल है
हर तरफ मुन्नी-शिला-चमेली
सरे आम बदनाम है यहाँ
क्यूंकि आदमी की "अयाशी विलासिता"
के लिए नारी का कुछ न मोल है
नारी का कुछ न मोल है....

सत्येन्द्र "सत्या"


Monday, 9 July 2012

"संकोच का सांप"


     "संकोच का सांप"


दुनियाँ मदमस्त हो जीती रही
मै संकोच में मरता रहा
कभी सोचा कि कह दूँ उनसे
कि मेरे सिने में ज्वार कैसा है
दिखा दूँ उन्हें कि मुझमे
शक्ति का सामर्थ्य कितना है
पर जब कभी भी कदम बढ़ाता
संकोच का सांप सर उठाये सामने आ जाता
संकोच का सांप सर उठाये सामने आ जाता....

सांस थम सी जाती
मन घबरा जाता
ऐसी विचित्र अवस्था में
निकला कदम डर के पीछे आ जाता  
निकला कदम डर के पीछे आ जाता...

तब मन में ख़्याल आता
कि अब दशा के लिए दिशा बदलूँगा
सफलता की मोतियों को अर्जित करने हेतु
फिर घर से निकलूंगा
साहस के बल से
स्वयं को फिर सक्षम करूँगा
एक नया रास्ता चुनूँगा
अभी सहम-सहम कर
कुछ फासलें तय किये ही थे
कि फिर संकोच का सांप सर उठाये सामने आ जाता
फिर संकोच का सांप सर उठाये सामने आ जाता......

आँखों को समझ ना आता
कि यह क्या माज़रा है
क्यूँ संकोच का सांप हर राह पर खड़ा है
तन जवान किन्तु रक्त इतना ठंडा क्यूँ हो चूका है
कि शरीर की आत्मा पर संकोच का भूत भारी है
मानवीय आत्मा क्या इतनी संकुचित हो गई
कि आज संकोच से हारी है.......

बार-बार दिमाग में
गूंजते इन प्रश्नों ने
मुझे आज इतना विवश कर दिया
कि मन से डर तन से शर्म उतर गई
और कल तक मुझे डराने वाला सांप
देख मुझे निडर इन रास्तों पर चलता
स्वयं डर कर अपना रास्ता बदल गया
स्वयं डर कर अपना रास्ता बदल गया.......



सत्येन्द्र 'सत्या'

Monday, 2 July 2012

मै भी कभी बच्चा था...




बचपन की मस्ती 
किताबों से सजी बस्ती
एक शर्मीली सी लड़की
जिसे देख बनता था मै हीरो
उस छड़ी की मार
वो गणित का ज़ीरो
आज भी दिल को बहुत हँसाता है...


क्लास का ऐसा लफंगा
जो कलम की करता हेरा-फेरी
जिसके शर्ट की होती टूटी बटमें
बेवजह बैठ उन गप्पों का लगाना
आलस के मारे नोट बुक ना बनाना
रोज़ पड़े थप्पड़ रोज़ सुनू ताना
घर तक पहुँच जाती कम्पलेनों की फ़ाइल
कि आप के बेटे का future नहीं अब bright
ऐसे थे अपने शरारत के दिन
कैसे भूल जाऊं वो बचपन का जमाना
                       वो बचपन का जमाना.....

वो क्रिकेट का मैदान
जहाँ कोई चिटिंग का बादशाह
कोई नौटंकी की दुकान
वो आपस की मारा-मारी
पर कभी टूटे न दोस्ती साली
सड़कों पर देखते ही परियाँ
मुहं से निकल जाती थी सीटी
हम कभी इतने थे निक्कमे..इतने कमीने 
आज यकीन नहीं होता
वो बचपन का जमाना
वो बचपन का जमाना !!!!

सत्येंद्र "सत्या"



Monday, 25 June 2012

'चाँद' इस रात को क्या हो गया है???

इस रात को क्या हो गया है
आँखों में न नीद है
न दिल को सकूँ है 
गुमनामी के अंधेरों में पड़
शहर भी अपनी रंगत खो रहा है
अब तू ही बता दे 'चाँद'
कि इस रात को क्या हो गया है....


मंजिल की तलाश में
गुमराह बना राही
माया में मग्न होकर
जो अपनों से दूर हो गया है

अब तो मन मेरा भी
विरानी की वेदना में डूब
बहुत रो रहा है..बहुत रो रहा है..
अब तू ही बता दे ए 'चाँद'
इस रात को क्या हो गया है..
इस रात को क्या हो गया है..

सत्येंद्र "सत्या"


Friday, 22 June 2012

सिसक-सिसक कर रो रही थी खड़ी...

"वियोग की बेबसी"

सिसक-सिसक कर रो रही थी खड़ी
न जाने किस के इंतज़ार में
दिल में तड़प चेहरे पर शिकन लिए
मन की बैचनियों से
किसी को ढुंढती
सावन के इस फुव्वार में
सिसक-सिसक कर रो रही थी खड़ी
न जाने किस के इंतज़ार में....

शायद कोई तो था
जिसे चाहती थी वो 
जिसे मानती थी वो
जिसके आने की चाह में
पलकें बिछाए
जिए जा रही थी
वियोग की आग में
पर कहकर भी ना
आया प्रियवर भला
उससे मिलने की आस में
उससे मिलने की आस में.....

बरसों से सपने सजोये
प्रियवर की याद में
खोई-खोई सी रहती थी
किसी से कुछ न कहती थी
पर उस शाम आई चिठ्ठी ने
उसे रुलाकर रख दिया
क्षण भर में सब कुछ
क्षीण-भिन्गुर सा कर दिया
मानो ख़ुशी कुछ ऐसी छिनी उससे
कि लब्ज़ खामोश हो गए
आँखे नम रह गई ......

सत्येंद्र "सत्या" 

"मन के भाव जब अर्थ बन जाए"

"मुद्रा" तुम बिमार क्या हुई मुल्क का "विकास" बदहाल हो गया...


अब तो 'मेघा' के दामन से निकल आ 'सावन' वरना 
इस मासूम "शहर" को तपीश की नज़र लग जाएगी...

जिसे पाने की चाह में मै निकला था घर से
वही आज मेरी गुमनामी का सबब बनी...


तेरे मुल्क का मंज़र कितना बदल गया "गाँधी"
 की चूहे खाने में शेर हुए 
और इंसान अब भी "भूख" से बिलकता है...


"उर्दू" में असर तो है जावेद कैफ़ी ग़ालिब जो अपने अल्फाजों से...
दर्द भरी सुराही से भी मोहब्बत का सैलाब बहा दे...


मुझे 'रोशनी' की दरकार थी पर नादान 
वक़्त ने रिश्ता 'अँधेरे' से जोड़ दिया........


उम्मीदों की दुनियां में मैंने भी दस्तक़ दे दी 'साहिल' 
क्या पता तेरी 'लहरें' मुझे भी मंज़िल का किनारा दिखा दें...


मै हवाओं में उड़ाता प्यासा परिंदा हूँ...वो नादान
मुझे पानी पीता देख ज़मीं का बसिंदा समझ बैठे.....


तेरे आँखों में "आंसू" न होते अगर बेरहम जमाने के डर से
तो मै मजबूर न होता इस "अंगूर के रस" को ओठों से लगाने को...

सत्येंद्र "सत्या

Thursday, 21 June 2012

साज़िश की आग ???

साज़िश की आग ???

कैसी रची 'साज़िश'
कि उठ रहा है धुआँ
जल रही 'सबूतों' की दास्ताँ
अगर मैं मान भी लूं इसे एक 'हादसा'
अगर मैं मान भी लूं इसे एक 'हादसा' 
तो 'क्यूँ' हुआ ये हादसा
शहर के उस 'मकान' में
शहर के उस 'मकान' में ???


सत्येन्द्र "सत्या"



राजनीति......

वाह रे राजनीति!!!
तेरा मिजाज़ बड़ा निराला है
न कोई दोस्त न कोई दुश्मन
सब अवसरवाद का ड्रामा है
कल के कठोर आज मुलायम
दादा ख़ातिर दीदी छोड़ी
दिखा दिया कुश्ती का खेल
विवादों की रेला रेली में
ममता को बोला "एकला चलो"
और स्वयं को कर दिया सेल....

वाह रे राजनीति!!!
तेरा मिजाज़ बड़ा निराला है

सत्येन्द्र "सत्या"

Wednesday, 20 June 2012

"ख़ामोशी का दर्द"

यूँ चुप न रहो...


मेरे कलम की स्याही ख़त्म हो गई 
तुम्हे शब्दों में बयां करते करते
तुम हो की अब भी खामोश बैठी हो
मुझसे बेपनाह प्यार करते करते...

घड़ियाँ गिन गिन
कलियाँ बिन बिन
फ़ूलों की सौगात लाती हो
पर जब मै पूछता हूँ
कि ये सुंगंधित पुष्प किसके लिए
तो न जाने क्यूँ शर्माती हो...

आँखों की ख़ुशी
मन की उमंग को
अपने भीतर छिपा
क्यूँ ह्रदय घात कर जाती हो
अरे कुछ तो कहो यूँ चुप न रहो
अरे कुछ तो कहो यूँ चुप न रहो 

तुम्हारा कहना मेरा सुनना
इस चंचल मन को बहुत भाता है
पर अब तुम
बसंत के गीत भी नहीं गाती
जिन्हें सुनकर
कभी अपनी पीड़ा भूलता था..
कभी अपनी पीड़ा भूलता था........


सत्येंद्र "सत्या"

Saturday, 9 June 2012

"मेरी गली से गुज़रने की गुस्ताखी न करना"

"मेरी गली से गुज़रने की गुस्ताखी न करना"

तुम हर रोज़ देख मुस्कुराया न करो
नादान दिल फिसल जाएगा
नैनों से नगमे बरसाया न करो
शांत मन चंचलता से भर जाएगा
'माना की तुम्हारी सुन्दरता में जादू है'
'माना की तुम्हारी सुन्दरता में जादू है' 
पर खूबसूरती का रस यूँ ही बहाया न करो
वरना सारा शहर तुम्हे पाने को मचल जायेगा.....

और मै तो मुसाफ़िर हूँ
इस अजनबी शहर में
कभी स्वयं पर वश ना रहा
तो ज़ुल्म हो जाएगा
तुम यूँ रंग दिखाया न करो
वरना शरीफों से भी गुनाह हो जायेगा....

तुम्हारी चाहत में पड़
न जाने चले गए कितने
बस गुजारिश है "सत्या" की तुमसे
कि रास्ते बहुत मिल जायेंगे
तुम्हे जानेवाले
बस मेरी गली से होकर गुज़रने  की
गुस्ताखी न करना

बस मेरी गली से होकर गुज़रने की
गुस्ताखी न करना..........


सत्येंद्र "सत्या"

Sunday, 3 June 2012

"प्यार पर परम्परा की पाबंदी"

"परम्परा के तले बुझ गया प्यार"

तेरी यादों के साये से
मिलकर पता चला कि
ज़िन्दगी की हक़ीकत क्या है
यूँ ही अपनों में अजनबी
बना फिरता था मै
इसलिए सोच भी ना पाया कि
आदमी की हक़ीकत क्या है
हर पल हर घड़ी तुझसे मिलने को
तरसते मेरे नैनों के आसूं
अब तू ही बता कैसे कह दूं
इन्हें कि हमारे
रिश्ते की असलियत क्या है

पग पग चलता गया पथ पर
अपनों से लड़ता गया हर पल
फिर भी तू गैरों की तरह चली गयी
तुझे पाने की ख़ुशी नहीं थी उतनी
जितना आज खोने का ग़म सता रहा है

क्या यही सच्चाई है इस जहाँ की
जहाँ वसूल प्यारे हैं प्रेम प्यारा नहीं
जहाँ क्रूरता का शासन है
पर मानवता का आसन नहीं
जहाँ अंधविश्वास प्यारा है
पर विश्वास की डोर प्यारी नहीं
जहाँ अंहिसा का तो जाप है
पर लोग हिंसा के पुजारी हैं

और तुम छोड़ चली इन झूठे
आडम्बरों की ख़ातिर
जहाँ इंसानों की इंसानियत ही
मान्यताओं की मारी है
अरे जिन्होंने प्रेम को परम्परा
की दीवारों में जकड़ा है
अपनी बनावटी शान के अधीन
हमारे प्यार को कुचला है
तू उनसे डर गई
तू उनसे डर गई ...........

सत्येन्द्र "सत्या" 

Monday, 14 May 2012

"मेरे साठ साल"

"मेरे साठ साल"


मै साठ बरस के 
प्रजातंत्र की मिशाल हूँ 
अतीत की याद से निकल 
वर्तमान की डगर पर खड़ी
भविष्य को निहारती 
मेरे इमारत से 
मुल्क का मुक्द्दर बनता 
मेरे इन दीवारों में 
आपकी आस्था की आवाज़ गूंजती
पर समय के चक्र के साथ 
मेरी दशा बदलती गई
और आलम देखिये कि,
एक साफ़-सुथरी तस्वीर
धूमिल सी नज़र आने लगी है

अपराधियों के दाग से
जनता की सरकार
जनता से दूर जाने लगी है
फिर भी मुझे उम्मीद है कि
लोकतंत्र का विश्वास
जिंदा है कही
क्यूंकि आप मुर्दा नहीं.....

"जिसकी आज़ादी के ख़ातिर वो कुर्बान हो गए
वही आज आज़ाद होकर भी मुर्दा है"

सत्येन्द्र "सत्या"


Monday, 30 April 2012

मै मजदूर हूँ!!!

मै मजदूर हूँ!!!


बड़ी सिज्जत से सवांरा
मैंने इस जहाँ को
गाँव की सड़कों
शहरों के सौन्दर्य-शान को

मेरा श्रम आपकी फसलों में है
मेरा श्रम इन गगन छूती इमारतों में
मेरा श्रम मुल्क के विकास में है
मेरा श्रम उज्वल ज्योति के प्रकाश में
मेरा श्रम नहीं तो कुछ नहीं
जो मेरे श्रम से चलता प्रगति का चक्का

किन्तु इतना श्रमिक होकर भी
स्वयं विलासिता से दूर हूँ
इन्ही के हाथो से चलते
ये कल-कारखाने
इन्ही हाथों ने ही रखी पूंजीवादियों की नींव है
पर यहीं  हाथ आर्थिक दृष्टि से कमजोर हैं
मुझसे ही होता है आधुनिक भारत का निर्माण
पर ना बन सका इस समाज की पहचान
क्यूंकि मै मजदूर हूँ
क्यूंकि मै मजदूर हूँ

सत्येन्द्र "सत्या"

Sunday, 29 April 2012

'मेरे "अल्फाज़" किसी के छिपे जज़्बात हैं'

'मेरे "अल्फाज़" किसी के छिपे जज़्बात हैं'  




मेरी 'चिट्ठी' ने 'शहर' में 'हंगामा' मचा रखा है 
अरे कोई उनसे भी तो पूछे 
जिन्होंने 'मुल्क' को ही
'मदारी' का 'तमाशा' बना रखा है....











'विश्वास' मर गया 'माया' के मेले में 
पर मै 'मुर्ख' न समझ पाया इसे
जो अब भी लगा पड़ा हूँ 
'दोस्ती' के 'खेलों' में .....













तुम 'हक़ीकत' से 
नज़र यूँ न चुराया करो 
'सपनो' में प्यार 
तो सभी को होता है.....













मेरी 'ख़ामोशी' का मतलब
पूछो इस 'मुल्क' से 
जहाँ 'इंसान' 
ज़िंदा होकर भी 'गुमशुदा' हो गया है...












इसे उसका बदला 'रंग' न समझना 
ये तो उसकी 'अदा' है
जिसपर 'इंसानों' का 
'वश' नहीं....






सत्येन्द्र "सत्या"

Saturday, 28 April 2012

तुमने भी साथ छोड़ दिया!!!

तुमने भी साथ छोड़ दिया!!!

मेरी इन आँखों का 
तुम्हे ख्याल न रहा 
जो टूट गई 
एक हल्के झटके से 
तुम्हारे सहारे 
अपनी नज़रो से 
ये शहर देखता था 
बस्ती,गलियां,बगियाँ 
फूलों से सजा 
हर मंज़र देखता था 
सनम की लिखी चिट्ठी 
में स्नेह के शब्द देखता था...

अब तुम ही बताओ 
क्या करूँ
कैसे तुम बिन 
उन हसीन पलों को जीऊ 
तुम्हे बनाने वाले भी 
कुछ दिनों की दुहाई 
मांगते है 
कैसे कहू उनसे 
कि,मेरा तुमसे 
तुम्हारा-मुझसे 
रिश्ता क्या है......

जो हुआ सो हुआ 
पर फिर कभी यूँ ही 
'क्षतिग्रस्त' न होना 
माना तुम हो बड़ी नाज़ुक 
पर मेरी 'कवच' हो 
बड़ी लचीली पर 
मेरे सफ़र की 'मदद' हो
माना तुम हो बड़ी नाज़ुक
पर मेरी 'कवच' हो
बड़ी लचीली पर
मेरे सफ़र की 'मदद' हो.....

                                                                                                                   
सत्येन्द्र "सत्या"



Friday, 27 April 2012

"राजनीति में ईमान बिक गया"


"राजनीति में ईमान बिक गया"

"राम" नाम का जाप है
किन्तु घर के "लक्ष्मण'
का दामन ही न साफ़ है
फिर भी दावा है
खिलाएंगे "कमल" क्यूंकि
भ्रष्टाचार में डूबा "हाथ" है
भ्रष्टाचार में डूबा "हाथ" है!!!!!

वाह-वाह क्या राजनीतिक  मिजाज़ है
मेरे भारत देश का
जहाँ सरकारों की निष्ठां ही नापाक है
आम-आदमी भूखा-नंगा हो रो रहा
पर कहने को यहाँ
लोकतंत्र का राज है
लोकतंत्र का राज है....

सत्येन्द्र "सत्या"

Sunday, 22 April 2012

***मेघा कब बरसोगी ***


***मेघा कब बरसोगी *** 

तुम  हर आये दिन छाती हो
हवा-आंधी संग लाती हो
किन्तु अब भी इंतज़ार है मुझे
तुम्हारी उन  मोटी बूंदों का 
जिसमे अपनी पलके भीगा संकू
बेरंग  बनी जिन्दंगी
गर्मी के मौसम  में
उसमे तुम्हारे पानी का
रंग मिला सकू
पर तुम ऐसा होने नहीं देती
जो दस्तक  तो देती हो
बारिस  के आने का
और फिर लौट जाती हो
और फिर लौट जाती हो...

अरे मेघा अब तो बरस  जाओ
जो डर लगता है बदन को
उन तपाती किरणों से
गर्म धुप की जंजीरों से
क्यूँ इस तरह लुक्का-छिपी
का खेल खिलाती हो
क्यूँ इस तरह लुक्का-छिपी
का खेल खिलाती हो .....


मेघा अब तो बरस जाओ
मेघा अब तो बरस जाओ ......

सत्येन्द्र "सत्या"

Saturday, 21 April 2012

"भारत की अग्नि "


"भारत की अग्नि "

मेरे गौरव की शान "अग्नि" है
मेरे शक्ति की पहचान "अग्नि" है
मेरे शांत आचरण को
कायरता का नक़ाब
समझाने वाले गीदड़ों(मुल्कों) को
इस शेर (भारत) का जवाब "अग्नि" है
इस शेर (भारत) का जवाब "अग्नि" है

सत्येन्द्र "सत्या"



बाबा शक्ति नहीं मदारी....

बाबा शक्ति नहीं मदारी....

भक्त निस्वार्थ हो
आस्था में खोया
बाबा स्वार्थी हो लोभ में
प्रवचन तो महज़ जरिया बना
धर्म की आड़ में लुट का
जहाँ तन-मन मैला हुआ सिर्फ
वस्त्र और नाम "निर्मल" रह गए.......

सत्येन्द्र "सत्या"


"नशा" कह अपने से दूर कर दिया.....


"नशा" कह अपने से दूर कर दिया..... 

कोई तुझे बदनाम करे
तो क्यूँ चुप रहू मै
जब मै तनहा था
तो तुने साथ दिया
शरीफों की शराफत
बिक रही थी
लालच के बाजार में
दोस्ती को तरस गया था मै
कठिनाइयों की राह में 
तब तू ही थी जिसने सहारा दे
मेरे ज़िन्दगी से ग़म भुला दिया
खुदगर्ज़ इस दुनिया में
मुझे बेदर्दी बन
जीना सिखा दिया
मुझे बेदर्दी बन
जीना सिखा दिया......

जो कहते है तू बिगडैल है
उन्हें शायद अंदाज़ा नहीं
तेरे रंग-रूप का
तेरे मस्त-मिजाज़ स्वरूप का
अरे तुझमे तो वो बात है
कि दिल तो दिल
पैमाने भी झूम जाते है
तुझे खुद में मिलाकर
तुझे खुद में मिलकर.....

"शबाब" तो बैईमान है
कल-आज-कल कहाँ
किसे पता
पर "शराब" का ऐसा हश्र नहीं
मिली अगर दर्द से
तो उसे भी विहीन कर लिया
उदासीनता को
कोंसो दूर कर दिया....

पर जिन्हें ख़बर नहीं
उन्होंने तुझे गलत कह दिया
उन्हें कैसे बताऊँ
कि ग़म और ज़िन्दगी के बीच की ख़ुशी तू है
जिसे उन लोगो ने नशा कह
अपने से दूर कर दिया
जिसे उन लोगो ने नशा कह
अपने से दूर कर दिया.....

सत्येन्द्र "सत्या"

Friday, 20 April 2012

तुम कहाँ हो ???


तुम कहाँ हो ???

जब से तुम ओझल
हुई हो इन आंखो से
दिल ने प्रश्नों
की झड़ी लगा दी
कुछ न कहू इसे
तो बेचैन रहता है
कुछ कहू तो बेकरार हो जाता
तुम्हे पाने की ख़ातिर.......

समझ नहीं पाता हूँ
क्या कहूँ इससे
कि क्यूँ तुम दूर हो
मोहब्बत की तड़प होकर भी
क्यूँ मजबूर हो....

कास दिल भी पहचान पाता
बंधन की बंदिशें और
रिश्तों की उलझनों को
तो इतनी कोशिशों के बाद भी
मै लाचार न होता
इस तरह कभी मेरे
मिलन के 'कलम' से वियोग
की 'कविता' का प्रसार न होता

मिलन के 'कलम' से वियोग
की 'कविता' का प्रसार न होता...

यदि तुम्हारा विवेक
अब भी जीवित है
तो मेरे इस दिल की तसल्ली
को बुझा देना
मुश्किल है मिल के अगर
कुछ कह पाना
तो बस इस बेचैन दिल को
एक बार आवाज़ लगा देना
एक बार आवाज़ लगा देना .......

सत्येन्द्र "सत्या"

Thursday, 19 April 2012

"कुदरत के कहर की कम्पंनता"


"कुदरत के कहर की कम्पंनता"

जीवन की विलासिता में पड़
हरियाली को लाल करता गया
विकास का लोभ ऐसा छाया
कि पर्यावरण इसको न भाया....

किन्तु वो भी कब तक
खामोश रहती
कब तक इंसानी क्रूरता
यूँ ही सहती.....

दिखा दी अपनी शक्ति..

प्रकृति के प्रहार से
सब कुछ खो गया
मानवीय विकास
विनाश के "भूकंप" में
सदा के लिए सो गया....

मानवीय विकास
विनाश के "भूकंप" में
सदा के लिए सो गया....

सत्येन्द्र 'सत्या'

Sunday, 15 April 2012

गैरों के शहर में मुलज़िम बना दिया !!!


गैरों के शहर में मुलज़िम बना दिया !!!

उसे पाने की चाह में
मै 'गुनाह' करता गया
रुक-रुक कर ही सही
जमाने से लड़ता गया
किन्तु वह अंजान थी
मेरे इन कोशिशों से
दिल की तड़प
प्यार की दूरियों से.........

मोहब्बते-इश्क में
ऐसा डूबा की दोस्त
भी दुश्मन बन गए
दर्द के सैलाब में
सब-के-सब छुट गए
पर उसे एहसास न हुआ
पर उसे एहसास न हुआ......

जो जमाने के संग मिल
अपनी नज़र बदल दी
समझी ना मेरे हालातो को
और कसूरवार कह चल दी.....

मेरी शराफत बदनाम हुई
जिसकी ख़ातिर उसीने
मेरा तमाशा सरे आम किया
मुलज़िम बना दिया
मुझे गैरों के शहर में
जिससे बेपनाह प्यार किया
जिससे बेपनाह प्यार किया........

सत्येन्द्र "सत्या"


Friday, 13 April 2012

उधम तुम याद रहोगे........


उधम तुम याद रहोगे
आने वाली कई पुश्तों तक
पंजाब की वादियों से लगा
भारत की हर गलियों तक
उधम तुम याद रहोगे.........

वतन की आज़ादी का
सपना था आँखों में
अंग्रेजों को मार भगाने की
तड़प थी हर साँसों में
देश-भक्ति की ज्वाला
भरी पड़ी थी ह्रदय की नसों में
उधम तुम याद रहोगे.......

जब फंसे भारतीय
डायर के जालों में
खून का मंज़र लगा
लगा पड़ा था
जालियावाला के बागो में
भारत माँ की माटी
भी तब रो पड़ी थी
शहीद सपूतों को ले
अपनी बाहों में.....

किन्तु क्रोध को तुने
छिपा रखा था सिने में
देख बहते अपनों के लहू
जलिया के ज़ंजीरो में.....

अपने उधम के "उद्धम"
से चित्त कर डायर को
दिया अपने बदले को अंजाम
जिसे सुन धरती भी खुश हुई
जिसमे बसा था शहीदों का प्राण
जिसमे बसा था शहीदों का प्राण......

उधम तुम याद रहोगे
आने वाली कई पुश्तों तक
पंजाब की वादियों से लगा
भारत की हर गलियों तक
उधम तुम याद रहोगे.........

सत्येन्द्र "सत्या"

Monday, 9 April 2012

"दिल दे दिया पहली मुलाकात में"

"दिल दे दिया पहली मुलाकात में"

जब मंज़िलों की तलाश में
मिले हम एक राह पर
इस अजनबी  शहर में
उस अजीब  बात पर
जवानी का ख़ुमार भी था
अपने पुरे शबाब पर
की मन-मन को भा गया
उस एक मुलाकात पर
उस एक मुलाकात पर....


तुम दूर हो जानकर
दिल उदास बैठा है
प्यासा मन लेकर
नदी के पास बैठा है
तुम्हारे पैरो की आहट
पायलों की खनखनाहट
गूँजती अब भी कानो में....

तुम्हारे शब्दों की माला
हर पल हँसाती रहती है
उदासीनता की राहों में
तुम्हारी शरारत रंग भरती
नफ़रत की मैली दीवारों में
तुम्हारा गुस्सा भी मोम की
तरह पिघल जाता चंचल
नैनों के बहाव में......

मेरा खेलना भी अब
गवारा नहीं तुम्हारे बिना
मेरे दर्द का कोई
सहारा नहीं तुम्हारे बिना
मेरा साहस भी खो जाता है
जब तुम संग नहीं होती

मुझको को अब भी आस  है
तूम जल्द आओगी
दिल की पीड़ा पर
प्रेम की औषधि लगाओगी...

दिल की पीड़ा पर
प्रेम की औषधि लगाओगी.........

सत्येन्द्र "सत्या"

Friday, 6 April 2012

"हौसला न कम होने देना"



हौसला न कम होने देना

मिशाल अब भी जल रही है
उस स्वप्न के निर्माण की
जिसके इच्छा में कुर्बान हुए
वो वीर सपूत भारतीय...

रास्तें तो डराते ही है
मंज़िलों की चाह में
फिर 'सत्या' तू क्यूँ
संकोच है कर रहा
नवीनता की बयार में....

सत्येन्द्र "सत्या"

Wednesday, 4 April 2012

"उसे कोई समझता नहीं"

"उसे कोई समझता नहीं"

वो अरमानों की ख़ातिर
ज़लालत में भी जीता गया
शर्म होकर भी आँखों में
बेशर्मी के घूंट पीता गया
पर शहरवालों ने कभी
समझी न बेबसी उसकी
जो हर कोई उसे पागल
कह पिटता गया
जो हर कोई उसे पागल
कह पिटता गया....

                                                                   सत्येन्द्र "सत्या"


Tuesday, 3 April 2012

जीत से हुँकार भर

रण के मैदान में
जीत से हुँकार भर
शक्ति के सामर्थ से
दुश्मन को पछाड़कर
अपने उर्जा को
बढ़ाता चल..बढ़ाता चल..

तेरी गर्जना से
डरता सारा जहाँ
तुझ पर नतमस्तक
सारी ज़मीं और आसमान
यह मुंबई की तक़दीर है
की तू उसका वीर है
इस सच पर "सचिन"
तू फिर उतर खरा और
गाढ़ दे 'IPL'  में मुंबई का झंडा जरा
गाढ़ दे 'IPL'  में मुंबई का झंडा जरा.....

तुझसे बड़ा न कोई 'शूरमा'
इस युद्ध के मैदान में
तुझसे बड़ा न कोई 'करिश्मा'
इस 'IPL' के मझधार में
तो कर MI को सफल
तो कर MI को सफल.....

सत्येन्द्र "सत्या"


Sunday, 1 April 2012

महँगाई-"मोहन" खाय जात है !!!

मँहगाई -"मोहन" खाय जात है !!!

आज अभी-अभी ख़त्म हुई क्लोजिंग की आफ़त से निज़ाद मिली ही थी की श्रीमती जी का फोन आ गया हुक्म था की आते वक़्त जरा विजय सेल्स में "हिटाची" की एक एसी बुक करवाई है उसे पैसे देकर लेते आईएगा...मैंने कहा अरे भाग्यवान इतनी जल्दबाज़ी भी क्या कल छुट्टी है आराम से ले लेंगे तभी उत्तर आया कहीं क्लोजिंग के चक्कर में ये तो नहीं भूल गए की रविवार से नया वित्तीय वर्ष शुरू हो रहा है...बस इतना सुनते ही याद आया १६ मार्च को पेश हुआ दादा का आम बजट जिसमे उत्पाद-शुल्क और सेवा-कर में वृद्धि का फ़रमान था....बस फिर क्या था पुरे रास्ते सोच में डूबा रहा कभी सब्जी-दूध मँहगे होने की चिंता तो कभी पप्पू के फ़ीस की फ़िक्र तो कभी मैडम के आभूषणों की.......क्या करे आम-आदमी बिचारा महँगाई का मारा......

आम आदमी का हाथ दिखा
मँहगाई का हाथ थमा दिया
घोटालो पर घोटाला तुमने किया
भरपाई का बजट हमें पकड़ा दिया
वाह रे सरकार के 'मनमोहन'
स्वंय लचर तो बने रहे
जनता को भी लाचार बना दिया
जनता को भी लाचार बना दिया.......

सत्येन्द्र "सत्या"

Tuesday, 27 March 2012

"तुझ बिन दिल उदास मेरा "

"तुझ बिन दिल उदास मेरा "

कब तक तेरी तस्वीर से दिल बहलाता रहूँगा 
कब तक तुझे आवाज़ लगता रहूँगा 
कब तक अतीत के अंधियारे मुझे डराते रहेंगे 
कब तक इन ग़मो मै मुस्कुराता रहूँगा 
कब तक तेरी याद यूँ ही सताती रहेगी 
कब तक तेरी जुदाई मुझे रुलाती रहेगी 
कब तक साहिल की लहरें बुलाती रहेंगी 
कब तक तेरी बातें दिल की बेचैनियाँ बढ़ाती रहेंगी 
कब तक तू सिर्फ सपनो में आकर तड़पाती रहेगी
और कब तक मै यूँ ही लिखता रहूँगा
कब तक तू यूँ ही ही पड़ती रहेगी 

कबतक ....कबतक ..... कबतक .......??????




                                                                    
सत्येन्द्र "सत्या" 

Saturday, 24 March 2012

'शहादत' भी शर्मसार इनसे !!!

'शहादत' भी शर्मसार इनसे !!!

" जरा याद करो कुर्बानी " 

मेरी शहादत को क्या कोई पहचान रहा !
भारत माँ का एक वीर सपूत था मै क्या यह कोई जान रहा !
भारतीय होने का कर्त्यव निभाया था मैंने !
अपने रक्त की आहुती देकर,दुश्मनों को मार भगाया था मैंने !
मेरे लिए वह लड़ाई सिर्फ "कारगिल" और "टाइगर हिल्स" नहीं थी !
मेरे लिए तो भारत माँ की प्रतिष्टा का सवाल था !
उस माँ की प्रतिष्टा के लिए ही इस बेटे ने दिया बलिदान थI !

पर आज विडंम्बना यह है कि, कोई मेरे लघु को नहीं पहचान रहा.
                                             कोई मेरे लघु को नहीं पहचान रहा.. ...


यह अल्फाज़ उस छिपी हकीकत की कहानी है जिसे आज भी नज़रअंदाज किया जा रहा है कल (२३ मार्च)शहीद दिवस था जब पूरा भारत उन वीरों (भगत सिंह,सुखदेव,राजगुरु) को याद करता है जिन्होंने "मुल्क की आज़ादी ही मेरी दुल्हन है" कह हँसते हुए फ़ांसी को गले से लगा लिया..पर शहीद दिवस मनानेवाला यह देश शहीदों के याद में ही (२६ जुलाई) को विजय दिवस भी मनाता है किन्तु इन दोनों के बीच का अंतर बड़ा ही साफ़ है एक में आज़ादी के ख़ातिर किया गया संघर्ष दिखता है तो दूसरे में स्वतंत्रता को शान से बनाये रखने तथा उससे समझौता न करने का जज़्बा दिखता है...तक़रीबन तेरह वर्ष हो गए कारगिल के उन वीरों की शहादत को जिन्होंने अपने हौसले,साहस,बहादुरी और आत्मविश्वास का परिचय देकर,दुश्मनों को उन कठिन हालातों में मार भगाया था,जिसे शब्दों से बयां नहीं किया जा सकता,वह मंज़र भी इतिहास के पन्नो में इस कदर शामिल हो गया की जिसके किस्से सुनकर आज भी हम खुद को गर्वान्वित महसूस करते हैं,वही पड़ोसी आज भी इसे लेकर शर्मसार हो जाता है!

किन्तु इन सैनिकों को शहादत के नाम पर क्या मिलता है..सरकारों से सम्मान या अपमान???

शायद प्रश्न जितना सटीक था उत्तर उतना सटीक न हो किन्तु इस प्रश्न का उठना ही अपने आप में एक संजीदा मसला है कारगिल युद्ध के दौरान 'ताबूत का कलंक' और उसके बाद शहीद 'अनुज नय्यर' के परिवार के साथ हुए अभद्र व्यव्हार ने तो तत्कालीन सरकार के निष्ठां पर ही सवाल खड़े कर दिए किन्तु सैनिकों के परिजनों का सर-दर्द सरकार बदलने के साथ ही समाप्त हो जाये ऐसा नहीं था..और इस बात को सिद्ध की धर्मनिरपेक्षता का आदर्श पाठ पढ़ानेवाली वह सरकार जो मुद्रा के लोभ में परिपेक्षता में पड़ गई और नेताओं और नौकरशाहों की मिली भगत से एक "आदर्श घोटाले" को जन्म दिया....कारगिल युद्ध के दौरान शहीद हुए सैनिको के विधावाओं के लिए 'आदर्श योजना' के तहत उन्हें बिल्डिंगों में फ़्लैट आवंटित किये जाने थे मगर पर्दे के पीछे की सच्चाई अलग ही थी महाराष्ट्र के क़द्दावर नेताओं से लेकर अफसरशाहों तक सबने उस पर कब्ज़ा किया किन्तु समझना जरा भी मुश्किल न था की इन्होने ने युद्ध के दौरान क्या किया?? क्यूंकि आदर्श बिल्डिंग की फाईलों को इनकी टेबल से होकर ही गुजरना था सो इस मेहनताने में कुछ फ़्लैटस को अपने सगे संबंधियों के नाम पर कर दी इस घोटाले के चलते ही  उस समय के वर्तमान मुख्यमंत्री को अपनी कुर्सी से हाथ धोना पड़ा था.....


बहुत अज़ीब लगता सरकारों की ऐसी मानसिकता देखकर,जहाँ सैनिक देश प्रेम के आग में खुद को अपने माटी के ख़ातिर समर्पित कर देता है, वही दूसरी ओर बोफोर्स,सुखोई, ताबूत और आदर्श जैसे कांड,यह बताने के लिए काफी है, की हमारे सरकारें सैनिको और शहीदों के लिए कितनी सहज है! क्या कभी ऐसा भी दिन आएगा जब शहीदों को सही सम्मान और सनिकों को बिना गड़बड़ी प्रयाप्त रक्षायुक्त साधन उपलब्ध होंगे?????

बचपन में इतिहास के पन्नो में पढ़ी यह पंक्ति को बार-बार दोहरा सोचने पर विवश हो जाता हूँ कि, क्या आज भी हकीकत से इसका सरोकार है या नहीं ???

शहीदों के चिताओं पर लगेंगें
हर बरस मेले
वतन पे मिटने वालों का
बाकी यही निशा होगा..


सत्या "नादाँ"