Monday, 19 February 2018

शिक़ायतें बहुत हैं "तुमसे"...

शिक़ायतें बहुत हैं "तुमसे"...

शिक़ायतें बहुत हैं तुमसे 
वक़्त को बेवक़्त करने की 
नर्म... नर्म...
ज़रूरतों को ज़िंदा रख 
जिस्म को जर्ज़र करने की 
कभी आईना कभी आंचल
कभी जाम.. कभी ज़ीनत..
आहिस्ता.. आहिस्ता...
दिल में ख़ुद को बसर करने की 
शिक़ायतें बहुत हैं तुमसे 
शिक़ायतें बहुत हैं तुमसे 

नशा नज़र को नूर का देकर 
फ़िराक़ में चाँद के चूर कर जाना 
शहर....... के अंदर शहर 
बे अदब... बे क़रार बादलों सा 
रूह.. रूह.. बदन का
कागज़-क़लम-किताब तर जाना 
ज़बान.. ज़बान.. ज़ख्म़ लिए
एक क़फ़स में क़ैद ज़िन्दगी

ज़बान.. ज़बान.. ज़ख्म़ लिए
एक क़फ़स में क़ैद ज़िन्दगी
ख़्वाहिशों से टकरा-टकरा कहती 
शिक़ायतें बहुत हैं तुमसे 
शिक़ायतें बहुत हैं तुमसे.......


सत्या "नादाँ"

Tuesday, 6 February 2018

"विकास" विख़्यात विश्व में... और "आनंद" घर में ही अज्ञात है !

चाय पकौड़े की खातीरदारी
अब लोकतंत्र में ख़ास हुई
भाईचारा भौकाल हो गया
मज़हबी हर मकान हुई
ज़मीन साफ़
ज़बान गन्दी
झाड़ू बस एक
स्वच्छ भारत की पहचान हुई 
इस सियासत ने "माँ" को भी नहीं बख्शा
लहू लतपथ रोज़ बेटों का
सरहद ख़ूनी घमासान हुई
2G... 2G... 2G...
क्या ज़ोर... ज़ोर का नारा था
अब जी.. जी.. जी.. गा रहे
यह कैसी "मन से मन" की बात थी
बजट ने बेबस कर दी
घर में दो जून की रोटी
विकास.. विख़्यात विश्व में
और आनंद घर में ही अज्ञात है...

सत्या "नादाँ"

Monday, 13 November 2017

"दिल" बच्चा ही अच्छा था....

"दिल" बच्चा ही अच्छा था....

ना कपट था
ना कशिश थी
हाँ..... किताबें
थीं
चित्रों से सजी हुई
ज़हन में सनी हुई
उलझनों से बेख़बर
उस उम्र के आग़ोश में

आज "दिल"
एक शहर है
धुओं की धुंध में पड़ा
हैरान - परेशान
नफ़रतों को समेटे
ज़ज़्बातों से जंग करता
इश्क़ की तलाश को

जब बचपन था
तो ख़ुशी थी....
पर मुझे पता नहीं
आज जवानी जानती है
उसके मायने
पर ख़ुशी है कि, जल्द आती नहीं !!!!

सत्या "नादाँ"

Tuesday, 19 September 2017

उफ़ !!!! ये बरसात...

खड़ी गाड़ी
पड़ी गाड़ी
गाड़ी पर चढ़ी गाड़ी
सब हैरान से चेहरे
तनाव ग़हरे के ग़हरे
सच.... सोच को रुला रही है
क़शमक़श ज़िन्दगी
इंतज़ार इंतज़ार में
सर्द सहमी सिमटी जा रही है
वो मुझे देखे
मै उसे देखूं
नज़र नज़र से
कुछ बता...
कुछ छिपा रही है 
घूर घूर घड़ी देखते सारे
मोबाइल जेब की...
रुक रुक बजती जा रही है
सब्र अब बेसब्र होने लगा
भीगी ज़मीन भीगा जिस्म
आज
भीगी भीगी सारी उम्मीदें हैं
शहर समझ ही नहीं पा रहा
भीड़ भय में...
तितिर.... बितिर
पसरती जा रही है
उफ़ !!!! ये बरसात...
उफ़ !!!! ये बरसात...

सत्या "नादाँ"


Tuesday, 25 July 2017

"शहर की वो बरसात"

"शहर की वो बरसात"

पानी में पसरा
रास्ते को रास्ते से जोड़ता वो पूल
क़मर तक डूबी गली
से होकर गुज़रते स्कूली बच्चे
नहर बन चुकी सड़क पर
सहमे.. सहमे.. सरकते
टेक्सी ऑटो  बस
और वो लोकल...
जो दुनियाँ को शहर की भागम भाग
ज़िन्दगी से रूबरू कराती
बंद... बेबस... बेचैन...
जलमग्न पटरियों पर खड़ी
वक़्त को कोसती
मुसाफ़िर मुसीबत में
"माया" मुश्क़िल में
भीगी ज़मीन
भीगा जिस्म
पानी पानी प्रलय घोल
मंज़र मेरा मुझे हिलाता
क्यों गगन
हो गया बेरहम
सवाल सवालों से सवाल करता
टूटा नक़्शा मेरा मुल्क़ से
लाश लाश ज़िन्दगी
समंदर... शहर... अश्क़
आज भी उन चोटिल अरमानों के
निशान कहता
शहर की वो बरसात
शहर की वो बरसात
शहर की वो बरसात

सत्या "नादाँ"

Monday, 19 December 2016

बेबस बस्ती

बेबस बस्ती

जर्ज़र इमारतें
गली सुखकर टूटी पड़ी
पानी की प्यास से
घर से घर की दूरी बढ़ी
कभी शोर कभी चोर की
गूँज से दहलता नगर
दहशत की दीवारों से बंधे
हम सब के घर
नज़र देखती तमाशा
आवाज़ ख़ामोशी की ग़ुलाम है
ज़िन्दगी जो हर रोज़
देखती नया सवेरा
वही हर वक़्त
ख़ुदग़र्ज़ी के नाम से बदनाम है
और कैसी बस्ती बसी है
यहाँ इंसानों की
जहाँ इंसानियत ही
मायूसी के अँधेरे में ग़ुमनाम है....

सत्या "नादाँ"

अधमरी "अनामिका"

अधमरी "अनामिका"

सर्द सुबह की उस रोज़
घर के दरवाज़े से दूर
बिजली के तारों को थामे
गली के अंधियारों में खड़ा
गिरते पानी को निहारता
कि एक ज़ोर की... चीख़
ज़र्रे.. ज़र्रे.. को झकझोरती
तेज़ी से निकलते … आती
आवाज़ का असर भी इतना
कि.. लगा किसी दहशत ने
द्वार पे... दस्तक़ दे दी
मंज़र देख उमड़ी भीड़
अभी जिस्म को सहला ही रही थी
कि... अनामिका
ख़ामोशी के आग़ोश में सो गई....
अनामिका...
ख़ुशी के संगम में सराबोर
वो हर दिन... हर पल
सपनों को समीप होता देख
शब्दों के आसमाँ सजा
आहिस्ता... आहिस्ता...
अरमानों के शहर बसाती...
अनामिका...
पहर दर पहर
तस्वीर बन आँखों में छाप छोड़ती
अदभुत नक्काशियों में ढली
शगुन की वो अंगूठियाँ
अब आंसू बन नज़रों में चुभती
कि...
अनामिका ये क्या से क्या हो गया ???

सत्या "नादाँ"