Saturday, 24 March 2012

"मासूम फ़लक की दर्दनाक दास्ताँ"


"मासूम फ़लक की दर्दनाक दास्ताँ"

ख्वाहिशों के साथ जन्मी ज़मीं पर
माँ की उम्मीदों का सपना-सजा
उम्र की छोटी दहलीज़ में
पिता की तनहाई का ग़म मिला...

पैदाइश के वक़्त निकली चीख़
आगाज़ थी ज़मीं पर फ़लक की
जहाँ इंसान अब हमदर्द कम
खुदगर्ज़ ज्यादा हो चूका था
जिस्म के खरीद-फरोफ़
की मंडी का मंज़र
गाँव से शहर तक लगा था
मगर मै नन्ही सी ज़ान
बेफ़िक्र-नादान
समझ न पायी माँ के हालात को
जो बिक गई हमारी ख़ुशी की आश को..


माया के इस पटल पर
उदासीनता ने ऐसा कहर ढाया
की ग़में सैलाब में
बह गयी ज़िन्दंगी मेरी
इंसानों की दरिंदगी से
ज़ख्म ऐसै मिले
की ख़ुशी की दस्तक से पहले
सांस थम गयी मेरी..


हैवानियत के दाँतों ने ऐसा जकड़ा
की ज़मीन फ़लक को नीगल गई
की ज़मीन फ़लक को नीगल गई......की ज़मीन फ़लक को नीगल गई



सत्येन्द्र "सत्या"

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