Sunday, 11 March 2012

कौन खिंचेगा लक्ष्मण रेखा ???


इस हत्या का दोषी कौन???

भारत को विकसित देश के रूप देखने की हसरत सभी लिए फिरते है किन्तु बदलने का "जाप" जपनेवाले लोगों को करने के नाम पर "मौनव्रत" याद आ जाता है! सरकारी दफ्तर से राशन की दुकान तक फैले व्यापक भ्रष्टाचार से परेशानी तो है किन्तु ज़ुबां नहीं खुलती और खुलती भी है तो पनवाड़ी (चोराहेबाजी करने की जगह) की दुकान पर और वहीँ उसे ताला भी लग जाता है......और जब हालत ऐसे हो तो प्रश्नों का उठाना वाज़िब है की 'विकसित -भारत' की पृष्ठभूमि की नीवं कौन रखेगा???

१) क्या ७६ वर्षीय वह वृद्ध (अन्ना) जो भ्रष्टाचार के विरुद्ध झंडा लिए सदैव खड़ा रहता है???
२) या वह IPS (नरेन्द्र सिंह) जो सिस्टम में रहकर खनन माफियाओं की नकेल कसने के कारण मारा जाता है???
३) या वह सज्जन-सक्षम लोग जिन्हें देश की संपत्ति को लुप्त करने में महारथ हासिल है???
४) या आप जो लोकतंत्र की इतनी बड़ी मिशाल है की स्वंय की व्यस्तता से ही फुर्सत नहीं मिलती???

गुरुवार को मुरैना में हुई एक घटना ने सिर्फ मध्य-प्रदेश को नहीं बल्कि पुरे मुल्क को शर्मसार करके रख दिया
जिस दिन सभी होली के रंग में सराबोर थे उसी समय मध्य-प्रदेश का एक जाबांज IPS आफिसर (नरेन्द्र सिंह) 
खनन माफियाओं के ख़िलाफ छेड़ी जंग की आहुती चढ़ गया जिसका सीधा सरोकार उन लोगो से था जो 'भ्रष्टाचार मुक्त भारत' का सपना सजोये बैठे है किन्तु विडंम्बना देखिये की यह कोई पहला वाकया नहीं है जब किसी ऑफिसर को ज़ान गवा कर इसकी कीमत चुकानी पड़ी हो,जबकि इस घटना ने अतीत में हुई उन घटनाओ की  याद दिलाती है जब बिहार के सिवान ज़िले के सत्येन्द्र दूबे को २७ नवंबर २००७ की सुबह गया में हत्या कर दी गई वह भी इसलिए की उन्होंने अपने ही महकमे यानी राष्ट्रिय राज्यमार्ग के निर्माण में चल रहे घोटाले का पर्दाफाश करने की कोशिश की..फ़िर भला शंमुघन मंजुनाथ को कौन भूला होगा कानपुर  IIM का यह छात्र लखनऊ में भारतीय तेल कम्पनी (IOC) में मार्केटिंग- मनेजर के पद पर तैनात रहते हुए तेल माफियाओं के करतूतों को उजागर क्या की, कि उसे भी अपनी मौत से इसका खामियाज़ा उठाना पड़ा और १९ नवंबर २००५ को लखीमपुर खीरी में पुलिस को उनकी लाश मिली शंमुघन मंजुनाथ कि हत्या ने आईआईएम छात्रो के साथ-साथ देश के युवाओं में रोष दिखा किन्तु यह अधिक दिनों तक नहीं चल सका....और जिन्होंने  भी भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए कदम बढ़ाया उनके उठते कदमो को क़तर कर इस कदर अपाहिज बनाया गया कि किसी हिम्मत न हुई कि फ़िर आवाज उठाए.................




आज़ादी के पश्चात् भारत विकास कि ओर अग्रसर तो हुआ किन्तु इस उभरते भारत कि एक कड़वी सच्चाई
यह भी रही कि विकास के संग भ्रष्टाचार भी बढ़ता चला गया पिछले कई सालों का आंकड़ा देखे तो पता चलेगा कि भ्रष्टाचार का सांप कुंडली मार किस भांति बैठा है और अब तो समस्या यह है कि यह सांप और भी मोटा हो गया है एंव अपने ज़हर से न जाने कितनो पर कहर ढा रहा है,मगर अचरज कि बात तो यह है कि इस सांप को दूध पिलाने वालों का ताँता सा लगा हुआ है जिसपर किसी का डंडा नहीं चलता...........शायद यही कारण है पहले "बोफ़ोर्स घोटाला",कारगिल युद्ध के दौरान का "ताबूत घोटाला " चारा घोटाला,मधु कोड़ा जी का घोटाला,कामनवेल्थ गेम्स घोटाला ,या २ जी घोटाला...घोटाला........घोटाला...........और घोटाला................


मीठी नदी (मुंबई) और यमुना नदी (दिल्ली) कब नदी से गटर या तलाव बन गए समझ में नहीं आया अर्थात कहने का तात्पर्य यह है कि जिन्हें अपना आकर बढ़ा लोगो कि समस्याओं का निवारण करना था वह भी इनकी भेंट चढ़ गए और घोटाले गटर से तालाब,तालाब से नदी फ़िर नदी से समंदर हो गए अब तो आलम यह है कि आये दिन इनमे सुनामी आती रहती जिसमे न जाने कितने बेक़सूर बह जाते है..किन्तु जो भ्रष्टाचार के सूत्रधार है उनका कुछ नहीं होता हाँ मुकदमा शब्द इनके नाम से जुड़ा ऐसा तकिया कलाम बन जाता है कि आये दिनों निचली अदालतों से उच्च न्यायालय तक भटकता रहता है और अगर गाहे बगाहे सर्वोच्च न्यायालय पहुँच भी गया तो फ़ैसला आने में इतनी देर होती कि वह जीवन का हर  लुत्फ़ उठा परलोक सिधारने कि तैयारी में रहते हैं...बहरहाल यह साफ़ कर दूँ कि मै भारत कि न्यायिक आस्था पर नहीं बल्कि व्यवस्था कि आलोचना कर उसमे बदलाव कि गुजारिश चाहता हूँ.....


क्या इन घटनाओं से हमारी नसें नहीं खिचती?? क्या हमारी संवेदना,वास्तविकताएं,इंसान प्रेम भी राजनेताओं कि तरह अवसरवादी हो गई है?? या अब हममे इतनी भी हिम्मत नहीं रही कि सही को सही और गलत को गलत कह समाज में अपनी आवाज़ को बुलंद भी कर सकें???  या शर्म हमारी आँखों से खो गई है कि हमने अपने आप को इस अनरूप ढाल रखा है कि इनसे कुछ फ़र्क ही नहीं पड़ता???

फ़िर ज़हन में सवाल आता है कि कौन खिचेगा लक्ष्मण रेखा?? 
भ्रष्टाचार कोई समस्या नहीं बल्कि वह घमंडी प्रवित्ति  है जो कि इस बात को दर्शाती है कि कोई मेरा क्या कर लेगा मै सबसे ऊपर हूँ बस यही भावना उस भ्रष्टाचार को जन्म देती है जहाँ पर इंसान खुद को कानून से ऊपर समझता है जिसपर लगाम लगाने के लिए लक्ष्मण रेखा खीचने  कि आवश्यकता है और यह तभी संभव है जब हम अपनी मानसिकता को बदलेंगे...और हम क्यूँ भूल जाये कि इसी जनता (भीड़) ने ही जेसिका को इन्साफ और अन्ना को लोकपाल के लिए मजबूत बनाया...फ़िर आज क्यूँ हम इन होती हत्याओं पर खामोश है!!!
कहीं 'राजनीतिज्ञों' की आलोचना के आड़ में हम अपनी 'सामाजिक' जिम्मेदारी तो नहीं भूल गए???









                                                                                                     

   सत्या "नादाँ"





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