Wednesday, 5 March 2014

बज गई है बाँसुरी.... लोकतंत्र के संग्राम की !!!



बज गई है बाँसुरी
लोकतंत्र के संग्राम की
ज़ोर है शोर है
प्रश्न घन घोर है
सियासत की साख पर खड़ा
भविष्य का भूगोल है
दिशा दिशा गूंजती
मत लत नहीं अधिकार के बोल हैं
मलंग में तरंग में
गीत में गगन में
गाँव गाँव गंभीर है
शहर शहर चिन्ह है
भारती भव्यता तलाशती
नीति के सियासी त्यौहार से
अस्त्र है.... शस्त्र है
ये विचारों का कुरुक्षेत्र है
विशाल भी विराट भी
विश्व विख्यात यह
स्वतंत्रता का श्रृंगार है
बज गई है बाँसुरी
लोकतंत्र के संग्राम की
बज गई है बाँसुरी
लोकतंत्र के संग्राम की !!!

सत्या "नादाँ"

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