बेबस बस्ती
जर्ज़र इमारतें
गली सुखकर टूटी पड़ी
पानी की प्यास से
घर से घर की दूरी बढ़ी
कभी शोर कभी चोर की
गूँज से दहलता नगर
दहशत की दीवारों से बंधे
हम सब के घर
नज़र देखती तमाशा
आवाज़ ख़ामोशी की ग़ुलाम है
ज़िन्दगी जो हर रोज़
देखती नया सवेरा
वही हर वक़्त
ख़ुदग़र्ज़ी के नाम से बदनाम है
और कैसी बस्ती बसी है
यहाँ इंसानों की
जहाँ इंसानियत ही
मायूसी के अँधेरे में ग़ुमनाम है....
सत्या "नादाँ"
जर्ज़र इमारतें
गली सुखकर टूटी पड़ी
पानी की प्यास से
घर से घर की दूरी बढ़ी
कभी शोर कभी चोर की
गूँज से दहलता नगर
दहशत की दीवारों से बंधे

नज़र देखती तमाशा
आवाज़ ख़ामोशी की ग़ुलाम है
ज़िन्दगी जो हर रोज़
देखती नया सवेरा
वही हर वक़्त
ख़ुदग़र्ज़ी के नाम से बदनाम है
और कैसी बस्ती बसी है
यहाँ इंसानों की
जहाँ इंसानियत ही
मायूसी के अँधेरे में ग़ुमनाम है....
सत्या "नादाँ"