
जानता हूँ पतझड़ में बहार नहीं लगते,
चंदा कभी सूरज के प्रकाश नहीं रखते ,
हादसे होंते रहते हैं शहरों में,
हर आदमी हादसों का शिकार नहीं होते,
तो क्यूँ इनसे अंजान हूँ मै,
जान कर भी नादान हूँ मै,
मंजिल को अपने नज़रों से देखता हूँ मै,
फिर भी पथ पर सहम कर क्यूँ चलता हूँ मै,
न जाने क्यूँ डरता हूँ मै..
जानता हूँ तनहाई कभी ख़ुशी का इजहार नहीं करती,
उदासीनता कभी जीवन का आधार नहीं बनती,
मोहब्बत कभी अंजाम का इंतज़ार नहीं करती,
फिर भी न जाने क्यूँ डरता हूँ मै
फिर भी न जाने क्यूँ डरता हूँ मै...................................................