Tuesday, 10 February 2015

है "आप - आप" की धूम !!!

जज़्बा है दीवानों सा
है "आप - आप" की धूम
दिशा - दिशा डोर बंधने लगी
खिलने लगे हैं "केजरी" के फ़ूल
सोया - सोया सारा समाँ
आज गा रहा...
आम - आम के गूंज
झाड़ू - झाड़ू झंकार दे रही
घर - घर खिली आस की धूप
मुद्दा - मुद्दा मूर्छित पड़ा था कल तक
आज मौसम - मौसम छाने लगा
ख़ास ख़ास.. ख़ौफ़ ख़ौफ़ में
नींद - नींद आप आने लगा
धरा.. धरा.. धरा का धीरज
इंक़लाब बन अंबर छाने लगा
बस वर्षा - वर्षा बाकी है आनी
बहाने जमे भारती के धूल
लोकतंत्र आज निखर पड़ा
दिल्ली की ख़ुशियाँ अब नहीं है दूर
आहिस्ता... आहिस्ता
सब चल चले उन संग
तुम भी आना...
जब एहसास हो जाए वो भूल
ना टोकेंगे... ना रोकेंगे..
"भारत - भारत" सबका उसूल
जज़्बा है दीवानो सा
है "आप - आप" की धूम...

सत्या "नादाँ"

Tuesday, 16 December 2014

तालिबान...

तालिबान...

दिल में दहशत
शहर शमशान
ज़िन्दगी बेबस
ज़ख़्मी जान..
जनाज़े में पड़े वो मासूम से चेहरे
ख़ून... ख़ून ज़मीन
आंसू... आंसू इंसान
बस सरहदों के बीच बंटा
वो... एक मुल्क़ नहीं
मेरा पड़ोसी है
जिसकी ना तो...
ज़मात से मैं जुदा हूँ
ना जुबान से...
सियासी सपेरों की पैदाईश... (तालिबान)
कभी ज़िहाद बन पनपती
कभी लिवास बन...
एक रोज़...
इस बंदूख... बारूद...दहशतग़र्दी
ने एक "मलाला" को भी मारा था
जो अब घर... घर ज़िंदा है
पहचान बनकर
पाक बनकर !!!!!
सत्या "नादाँ"

Thursday, 12 June 2014

"आफ़त में आशियाना"

 "आफ़त में आशियाना"

क्यों दू तुम्हे मैं अपना आशियाना
गुना है... चुना है
असर अस्ल तक बुना है
मेरी उम्मीदों का उमंग है ये
यही मेरे सपनों का सच समां है
रूह... रूह में बसी आदत इसकी
बचपन इन दीवारों संग पला है
कभी हंसी... कभी ख़ुशी
ज़िन्दगी ने ग़म भी बांटे इसके मयार में
मौसम ताउम्र गुज़रता गया मुसाफ़िर बन के
और आज भी...
दिल के सुकून का सफ़र
मेरी इमारत मेरा आईना है
निगाह निशाचर सी डाल डराते तुम
मेरी पनाह... मेरा जहाँ हिलाते तुम
कसूर किसका... कशिश में कौन
ज़माने को ज़ुर्म दे
पाठ क़ानून का पढ़ाते तुम
कहाँ ग़ुम थे जब बन रही थी ये
क्यों चुप थे जब चढ़ रही थी ये
खोया... खोया महकमा
तब क्यों सोया पड़ा था
और अब नींद से निकल चहक रहा
जब बीत गया अरसा
ख़ता तुमसे... और ख़त्म मैं
ये कैसी सज़ा है
ये कैसी सज़ा है......

सत्या "नादाँ"

Wednesday, 4 June 2014

"हवस" में "हिंदुस्तान"



फिर एक तमाशा मेरी मौत पर लगा है
हवस के हाथ ताक़त
क़ानून जुर्म का नशा है
घर से निकलते ही
माँ कहती... बिटिया ज़रा संभल के जाना
और फिर दबे पावं
पीछे-पीछे... आ जाती सड़क तक
ना चुप रहती... ना ठहरती
बस बेचैनियों संग बहती
मेरे सफ़र को सोच
उसकी सिकन...
बेहया.. बेशर्म.. ये घूरती आँखें बताती
नज़र का नशा थमता नहीं
भूख़ जिस्म की ज़हन में समाती
पहर क्या... क़हर था वो दरिंदगी का
कंगन टूटे... आंसू फूटे...
मैं चीख़ती रही...
दहशत से सोए नगर में
पर कोई ना आया.. पर कोई ना आया..
आज घर सुना सहमा हुआ है
पिता बेबसी में भटके पड़े..
माँ... मातम में डूबी जा रही
मंज़र देख... मुन्ना रोता
कि दीदी बोलती नहीं.. भीड़ आँगन में ये कैसा पसरा पड़ा है
ख़ुशी ख़ौफ़ बन गई ज़र्रे ज़र्रे की
हया हवन में जली जा रही
और मुल्क़ मुद्दो में मरा हुआ है....
सिवा शोर मैं कुछ भी तो नहीं
कल भी दबी थी.. आज भी दबी हूँ
ना जाने ये सिलसिला कब तक चलेगा ???

सत्या "नादाँ"

Sunday, 11 May 2014

माँ......

माँ......

मैं कल भी बच्चा था.. आज भी बच्चा हूँ
शायद ये वक़्त मुझसे बढ़ा हो गया है
कभी तेरे हाथों से खाता था खाना
आज वो खाना भी एक ज़माना हो गया है
नज़र नज़र निशान ख़ुदग़र्ज़ी के
शहर ये तरक्क़ी का...
गुमनाम आंसुओं का ठिकाना बन गया है
सुकून-ए-साँसों की नमीं सूखती तुझ बिन
क़दम लड़खड़ाते उम्र के इस पहर में
मोहब्बत मायूस होती जाती...
मुलाक़ातों के असर से.......
ज़र्रा-ज़र्रा दर्द की दास्ताँ कह रहा है
वो रंगत... वो आँचल... वो दुआएं...
बिखरने ना देती... बेचैनियों मे कभी
तू आदत मेरी... तू अमानत मेरी
रोज़ इन दूरियों को समझाउं कैसे
ख़ुशी की ख़बर ज़िन्दगी का बसर
सब तु हीं तो है....सब तु हीं तो है...
माँ......
मैं कल भी बच्चा था.. आज भी बच्चा हूँ
शायद ये वक़्त मुझसे बढ़ा हो गया है !!!

सत्या "नादाँ"

Friday, 4 April 2014

"फंदा" ही "हार" है "हैवानों" का !!!

"फंदा" ही "हार" है "हैवानों" का !!!

मिट्टी को मैला किया
पायल को तोड़कर
शक्ति शर्मसार खड़ी
आंसूओ को घोटकर
मै माया हूँ मगर महफूज़ थी
जुर्म के जात से
मेरी दुनियाँ उसकी रंगत
सब शहर की मुस्कान थे
पर वो आँखें हया ही खा गई
हवस के हाथ से
आज डरी है धरा
डरा है बादल
चिड़िया अपनी ही वादियों में
उड़ती संभाल के
मेरी फ़िज़ा फ़िज़ा बदल गई
दहशत के आगाज़ से
मेरी खामोशियाँ अब खौल रही
रोज़ सहना रोज़ मरना
अब नहीं बर्दाश्त है
मौत ही तेरी एक मंज़िल
गुनाह सोच का जो साथ है
बनना है मुझे वो ज़मीं वो सफ़र
जहाँ सुकून साँसों का एहसास है
देकर चोट रहना ज़िंदा
ये मुमकिन नहीं मेरे शहर में
तुझे सूली चढ़ना तो था ही
तुझे सूली चढ़ना तो था ही……

सत्या "नादाँ"

Thursday, 20 March 2014

धोनी "कप तान" दो !!!


धोनी "कप तान" दो 



सोच को संवार दे
मुश्किलों को टालकर
धोनी अब दे दना दन
बल्ले से बॉल पर 
विराट विक्राल है 
युवराज तैयार है 
शिखर भुजाएं खोलता 
रविन्द्र प्रलय को बेक़रार है 
संग्राम शौर्यता का प्रहार है 

उमंग दे मलंग दे 
जीत को तरंग दे 
विश्व के भूगोल पर 
तिरंगा ललकार कर 
ये खेल है प्रचंड 
आँख आँख में ठसन 
रण के मैदान से 
दुश्मनो को पछाड़कर 
अपने हौसले को उड़ान दे 
अमूल्य है अतुल्य है 
तू भारतीय का भव्य ग़ुरुर है  
इतिहास तेरी शक्ति पहचानता 
आज वर्तमान को तू एक इम्तिहान दे 
शान से अभिमान से 
फिर एक बार तू 
लड़ जा जहाँ से 
ट्वेंटी ट्वेंटी के घमासान को
विजय का मशाल दे 
सोच को संवार दे 
मुश्किलों को टालकर 

सत्या "नादाँ"