Tuesday, 27 March 2012

"तुझ बिन दिल उदास मेरा "

"तुझ बिन दिल उदास मेरा "

कब तक तेरी तस्वीर से दिल बहलाता रहूँगा 
कब तक तुझे आवाज़ लगता रहूँगा 
कब तक अतीत के अंधियारे मुझे डराते रहेंगे 
कब तक इन ग़मो मै मुस्कुराता रहूँगा 
कब तक तेरी याद यूँ ही सताती रहेगी 
कब तक तेरी जुदाई मुझे रुलाती रहेगी 
कब तक साहिल की लहरें बुलाती रहेंगी 
कब तक तेरी बातें दिल की बेचैनियाँ बढ़ाती रहेंगी 
कब तक तू सिर्फ सपनो में आकर तड़पाती रहेगी
और कब तक मै यूँ ही लिखता रहूँगा
कब तक तू यूँ ही ही पड़ती रहेगी 

कबतक ....कबतक ..... कबतक .......??????




                                                                    
सत्येन्द्र "सत्या" 

Saturday, 24 March 2012

'शहादत' भी शर्मसार इनसे !!!

'शहादत' भी शर्मसार इनसे !!!

" जरा याद करो कुर्बानी " 

मेरी शहादत को क्या कोई पहचान रहा !
भारत माँ का एक वीर सपूत था मै क्या यह कोई जान रहा !
भारतीय होने का कर्त्यव निभाया था मैंने !
अपने रक्त की आहुती देकर,दुश्मनों को मार भगाया था मैंने !
मेरे लिए वह लड़ाई सिर्फ "कारगिल" और "टाइगर हिल्स" नहीं थी !
मेरे लिए तो भारत माँ की प्रतिष्टा का सवाल था !
उस माँ की प्रतिष्टा के लिए ही इस बेटे ने दिया बलिदान थI !

पर आज विडंम्बना यह है कि, कोई मेरे लघु को नहीं पहचान रहा.
                                             कोई मेरे लघु को नहीं पहचान रहा.. ...


यह अल्फाज़ उस छिपी हकीकत की कहानी है जिसे आज भी नज़रअंदाज किया जा रहा है कल (२३ मार्च)शहीद दिवस था जब पूरा भारत उन वीरों (भगत सिंह,सुखदेव,राजगुरु) को याद करता है जिन्होंने "मुल्क की आज़ादी ही मेरी दुल्हन है" कह हँसते हुए फ़ांसी को गले से लगा लिया..पर शहीद दिवस मनानेवाला यह देश शहीदों के याद में ही (२६ जुलाई) को विजय दिवस भी मनाता है किन्तु इन दोनों के बीच का अंतर बड़ा ही साफ़ है एक में आज़ादी के ख़ातिर किया गया संघर्ष दिखता है तो दूसरे में स्वतंत्रता को शान से बनाये रखने तथा उससे समझौता न करने का जज़्बा दिखता है...तक़रीबन तेरह वर्ष हो गए कारगिल के उन वीरों की शहादत को जिन्होंने अपने हौसले,साहस,बहादुरी और आत्मविश्वास का परिचय देकर,दुश्मनों को उन कठिन हालातों में मार भगाया था,जिसे शब्दों से बयां नहीं किया जा सकता,वह मंज़र भी इतिहास के पन्नो में इस कदर शामिल हो गया की जिसके किस्से सुनकर आज भी हम खुद को गर्वान्वित महसूस करते हैं,वही पड़ोसी आज भी इसे लेकर शर्मसार हो जाता है!

किन्तु इन सैनिकों को शहादत के नाम पर क्या मिलता है..सरकारों से सम्मान या अपमान???

शायद प्रश्न जितना सटीक था उत्तर उतना सटीक न हो किन्तु इस प्रश्न का उठना ही अपने आप में एक संजीदा मसला है कारगिल युद्ध के दौरान 'ताबूत का कलंक' और उसके बाद शहीद 'अनुज नय्यर' के परिवार के साथ हुए अभद्र व्यव्हार ने तो तत्कालीन सरकार के निष्ठां पर ही सवाल खड़े कर दिए किन्तु सैनिकों के परिजनों का सर-दर्द सरकार बदलने के साथ ही समाप्त हो जाये ऐसा नहीं था..और इस बात को सिद्ध की धर्मनिरपेक्षता का आदर्श पाठ पढ़ानेवाली वह सरकार जो मुद्रा के लोभ में परिपेक्षता में पड़ गई और नेताओं और नौकरशाहों की मिली भगत से एक "आदर्श घोटाले" को जन्म दिया....कारगिल युद्ध के दौरान शहीद हुए सैनिको के विधावाओं के लिए 'आदर्श योजना' के तहत उन्हें बिल्डिंगों में फ़्लैट आवंटित किये जाने थे मगर पर्दे के पीछे की सच्चाई अलग ही थी महाराष्ट्र के क़द्दावर नेताओं से लेकर अफसरशाहों तक सबने उस पर कब्ज़ा किया किन्तु समझना जरा भी मुश्किल न था की इन्होने ने युद्ध के दौरान क्या किया?? क्यूंकि आदर्श बिल्डिंग की फाईलों को इनकी टेबल से होकर ही गुजरना था सो इस मेहनताने में कुछ फ़्लैटस को अपने सगे संबंधियों के नाम पर कर दी इस घोटाले के चलते ही  उस समय के वर्तमान मुख्यमंत्री को अपनी कुर्सी से हाथ धोना पड़ा था.....


बहुत अज़ीब लगता सरकारों की ऐसी मानसिकता देखकर,जहाँ सैनिक देश प्रेम के आग में खुद को अपने माटी के ख़ातिर समर्पित कर देता है, वही दूसरी ओर बोफोर्स,सुखोई, ताबूत और आदर्श जैसे कांड,यह बताने के लिए काफी है, की हमारे सरकारें सैनिको और शहीदों के लिए कितनी सहज है! क्या कभी ऐसा भी दिन आएगा जब शहीदों को सही सम्मान और सनिकों को बिना गड़बड़ी प्रयाप्त रक्षायुक्त साधन उपलब्ध होंगे?????

बचपन में इतिहास के पन्नो में पढ़ी यह पंक्ति को बार-बार दोहरा सोचने पर विवश हो जाता हूँ कि, क्या आज भी हकीकत से इसका सरोकार है या नहीं ???

शहीदों के चिताओं पर लगेंगें
हर बरस मेले
वतन पे मिटने वालों का
बाकी यही निशा होगा..


सत्या "नादाँ"

'स्वार्थहीत' नहीं 'जनहीत' में देखा "पॉर्न" !!!


एक नया समाज लाएँगे  

'धर्म' की सड़क पर 'अश्लीलता' की गाड़ी को 
नेताजी चलाये जा रहे हैं दौड़ाए जा रहे हैं
जनता बेचारी भूल गयी दिल की बिमारी 
जो 'डर्टी-डर्टी' कह चिल्लाएँ जा रही है..

अरे!भाई हम देश के नेता हैं
कानून बनाना हमारा ठेका है
तो शर्म क्यूँ करे
अश्लीलता से क्यूँ डरे
जब मुन्नी-चमेली का बज रहा बाजा है
शीला की जवानी का चारो ओर शोर शराबा है..


फ़िर "पॉर्न" से कैसी परहेज!!
हम इसे भी सबको दिखायेंगे
इस पर नया विधेयक लायेंगे
फ़िर कोई रोक न टोक
न ही किसी प्रकार का होगा दोष


'सभ्यता'तो एक बीमारी है
जिसमे डूबी जनता सारी है
इस अन्धविश्वास को भगाएँगे
समलैंगीगता का पाठ पढ़ाएंगे
सबको रगींन बनाएँगे
एक नया समाज लाएँगे
एक नया समाज लाएँगे...

चुकि: हमे इस "बिल" को देश में लाना है
इसलिए 'घर' में नहीं 'सदन' में देखतें है
जल्द ही इसे अम्लीय-जमा पहनाएंगे
सभी को पॉर्न दिखाएँगे
सभी को पॉर्न दिखाएँगे....


आप सुर से सुर मिलाये जा रहे हो
विपक्ष के साथ गाए जा रहे हो
हम है की 'स्वार्थहीत' नहीं
'जनहीत' में इसे देख रहे हैं
'जनहीत' में इसे देख रहे हैं....


सत्येन्द्र "सत्या"

"मासूम फ़लक की दर्दनाक दास्ताँ"


"मासूम फ़लक की दर्दनाक दास्ताँ"

ख्वाहिशों के साथ जन्मी ज़मीं पर
माँ की उम्मीदों का सपना-सजा
उम्र की छोटी दहलीज़ में
पिता की तनहाई का ग़म मिला...

पैदाइश के वक़्त निकली चीख़
आगाज़ थी ज़मीं पर फ़लक की
जहाँ इंसान अब हमदर्द कम
खुदगर्ज़ ज्यादा हो चूका था
जिस्म के खरीद-फरोफ़
की मंडी का मंज़र
गाँव से शहर तक लगा था
मगर मै नन्ही सी ज़ान
बेफ़िक्र-नादान
समझ न पायी माँ के हालात को
जो बिक गई हमारी ख़ुशी की आश को..


माया के इस पटल पर
उदासीनता ने ऐसा कहर ढाया
की ग़में सैलाब में
बह गयी ज़िन्दंगी मेरी
इंसानों की दरिंदगी से
ज़ख्म ऐसै मिले
की ख़ुशी की दस्तक से पहले
सांस थम गयी मेरी..


हैवानियत के दाँतों ने ऐसा जकड़ा
की ज़मीन फ़लक को नीगल गई
की ज़मीन फ़लक को नीगल गई......की ज़मीन फ़लक को नीगल गई



सत्येन्द्र "सत्या"

Friday, 23 March 2012

प्यार "समर्पण" का नाम है

प्यार "समर्पण" का नाम है 


जब वियोग की आग में तपस्या के, अश्रु भी सरलता के मोती बन जाए ! 
जब कलम की गई कलियों, में भी फूल खिल जाए ! 
जब दो ह्रदय दूर होकर, भी परस्पर मिलते रहें ! 
जब दूर होकर भी अम्बर, धरा को अपने प्रेम से भिगोती रहे !

तो बस इसे  ही प्यार का, संगम समझाना प्रिये ! 
तो बस इसे ही प्यार का, संगम समझाना प्रिये !





सत्येन्द्र "सत्या"

Wednesday, 21 March 2012

मेरे ग़ज़ल का रूप बदल गया

मेरे ग़ज़ल का रूप बदल गया 

अब  शहर  ही  शरीफ  ना  रहा
आप है की हममे शराफत ढूंढ़ते है !


ख़ुशी  की  तलाश  में  दर-बदर  भटका
वो थी की घर में मेरा इंतज़ार कर रही थी !

उन्हें मेरे आंसुओं का मोल नहीं
आँख है की हमेशा नम रहती है !


इसकी ख़ातिर वो कुर्बान हो गए
वही आज़ाद होकर मुर्दा है !

चाहत के नशे में चूर क्या
कि 'शराब' को 'शबाब' कह दिया !


सत्येन्द्र "सत्या"



"प्यार वक़्त का मोहताज़ है "

"प्यार वक़्त का मोहताज़ है " 

तेरे प्यार के रंग में रंगा हूँ मै 
तेरे हर मुस्कान से हंसा हूँ मै 
तू शायद "रूबरू" न हो मेरी तड़प से 
तू शायद "गुफ़्तगू" न हो मेरी डगर से  
कि,दिल भी मेरा अब तेरा हो गया है  
मेरी हर रूह में नाम तेरा रह गया है..

तुझे भूल जाना मेरे बस में नहीं  
तुझे गले लगा सकू इतना वक़्त भी नहीं  
अब तू ही बता की मै क्या करू
हम दोनों की बातें किससे कहू
न तुझे 'होश' है न मुझे 'होश' है
न तेरा 'दोष' है न मेरा 'दोष' है...


प्यार की राह में दिल भी मदहोश है
जिसे न घर का पता न
शहर का रास्ता मालूम बस
चाहत की दीवानगी में जिए जा रहा है
न चाहकर भी आंसुओ को पिए जा रहा है ....





सत्येन्द्र "सत्या"